दरभंगा राज की अंतिम महारानी कामसुंदरी देवी का निधन, अंतिम संस्कार संपन्न, मिथिला में शोक की लहर

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  • कंचन चौधरी

दरभंगा, 12 जनवरी 2026। बिहार के ऐतिहासिक दरभंगा राजघराने की अंतिम महारानी एवं स्वर्गीय महाराजाधिराज कामेश्वर सिंह की तीसरी धर्मपत्नी महारानी कामसुंदरी देवी का 96 वर्ष की आयु में निधन हो गया। वे लंबे समय से अस्वस्थ थीं और रविवार तड़के करीब सुबह 3 बजे कल्याणी निवास में उन्होंने अंतिम सांस ली।
सोमवार को उनका अंतिम संस्कार राजपरिवार के निजी श्मशान स्थल श्यामा माई मंदिर परिसर में पूरे विधि-विधान से संपन्न हुआ। उन्हें महाराज कामेश्वर सिंह की चिता के समीप अंतिम अग्नि प्रदान की गई।
मुखाग्नि महारानी के भतीजे/परपोते कुमार रत्नेश्वर सिंह ने दी।
अंतिम संस्कार से ठीक पहले कल्याणी निवास परिसर में पार्थिव शरीर जिला प्रशासन की उपस्थिति में अंतिम संस्कार की प्रक्रिया आगे बढ़ी। इस बीच युवराज कपिलेश्वर सिंह के अंतिम संस्कार में शामिल न होने को लेकर भी चर्चाएं होती रहीं।

प्रशासनिक व राजनीतिक हस्तियों की उपस्थिति
अंतिम संस्कार में दरभंगा के जिलाधिकारी कौशल कुमार, एसडीओ, सदर डीएसपी सहित प्रशासनिक अधिकारी मौजूद रहे। इसके अलावा बिहार सरकार के उद्योग एवं सड़क निर्माण मंत्री डॉ. दिलीप जायसवाल, समाज कल्याण मंत्री मदन सहनी, राजपरिवार के सदस्य, गणमान्य नागरिक एवं बड़ी संख्या में स्थानीय लोग उपस्थित रहे।
कई लोगों ने पार्थिव शरीर पर पुष्पांजलि अर्पित कर श्रद्धांजलि दी।

मिथिला में शोक


महारानी कामसुंदरी देवी के निधन से पूरे मिथिला क्षेत्र में शोक की लहर फैल गई है। उनके पैतृक गांव मंगरौली में अंतिम संस्कार तक किसी के घर चूल्हा नहीं जला। ग्रामीणों ने उन्हें सामाजिक सरोकारों से जुड़ी एक स्नेहिल और कर्मठ महारानी के रूप में याद किया।

जीवन परिचय और योगदान

महारानी कामसुंदरी देवी का जन्म 22 अक्टूबर 1932 को मंगरौली गांव में हुआ था। मात्र 8 वर्ष की आयु में विवाह के बाद उन्होंने दरभंगा राज की परंपराओं, मर्यादाओं और सांस्कृतिक विरासत को जीवनभर संजोए रखा।
वे महाराजाधिराज कामेश्वर सिंह कल्याणी फाउंडेशन की संस्थापक रहीं और शिक्षा, समाजसेवा, ग्रामीण विकास तथा सांस्कृतिक संरक्षण के क्षेत्र में सक्रिय भूमिका निभाती रहीं।

एक युग का अंत

महारानी कामसुंदरी देवी का निधन केवल एक व्यक्ति का जाना नहीं, बल्कि दरभंगा राज की गौरवशाली परंपरा के एक युग का अंत माना जा रहा है। सामाजिक, राजनीतिक एवं सांस्कृतिक जगत की अनेक हस्तियों ने उनके निधन पर गहरी संवेदना व्यक्त की है।
देशहित में उन्होंने 1962 के भारत-चीन युद्ध में अपने (दरभंगा राज) परिवार द्वारा 600 किलोग्राम सोना दान का उदाहरण आज भी प्रेरणादायक है। उनका निधन दरभंगा राज की गौरवशाली परंपरा के एक युग का अंत माना जा रहा है।
ईश्वर से प्रार्थना है कि दिवंगत आत्मा को शांति प्रदान करें और शोकाकुल परिवार को यह दुःख सहने की शक्ति दें।

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