- विंग कमांडर उमेंद्र त्रिपाठी
पटना: हर वर्ष 7 सितम्बर को अन्तर्राष्ट्रीय स्वच्छ वायु दिवस – नीले आकाश के लिए मनाया जाता है। इसका उद्देश्य स्वच्छ हवा के प्रति जन-जागरूकता फैलाना है, क्योंकि वायु ही हमारे जीवन का आधार है। यह विषय केवल मानव तक सीमित नहीं है, बल्कि पृथ्वी पर रहने वाले सभी प्राणियों और वनस्पतियों के अस्तित्व से जुड़ा हुआ है।
भारतीय जीवन-दर्शन में कहा गया है कि धरती पर जीवन का आधार पंचभूत हैं – क्षितिज, जल, पावक, गगन और समीर। ये पाँचों तत्व धरती माँ की गोद में समान रूप से व्याप्त हैं और समस्त जीव-जगत को जीवनदान देते हैं। इनमें से वायु का योगदान सबसे महत्वपूर्ण है, क्योंकि श्वास ही प्राण है और प्राण ही जीवन।
“प्राणो हि भूतानाम् आयुः” (अथर्ववेद)
अर्थात् प्राण ही सभी प्राणियों का आयुष्य है।
जैसे ही शरीर में वायु की स्थिति असंतुलित या विकृत होती है, वैसे ही शरीर की क्रियाशीलता घट जाती है। यही नियम सम्पूर्ण पर्यावरणीय व्यवस्था पर भी लागू होता है। हमारे वैदिक शास्त्रों में “पृथ्वी शान्तिः, वनस्पत्यः शान्तिः” का उल्लेख मिलता है। इसका तात्पर्य यही है कि हमें प्रकृति की शांति और संतुलन को अपने जीवन में उतारना होगा।
मैंने स्वयं भारतीय वायु सेना में 36 वर्षों तक सेवाएँ दी हैं। वहाँ प्रत्यक्ष अनुभव हुआ कि नीले आकाश का महत्व केवल सौंदर्य या स्वास्थ्य तक सीमित नहीं है, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा से भी गहराई से जुड़ा हुआ है। प्रदूषण के कारण जब दृश्यता (Visibility) घटती है तो विमानों का उड़ान भरना कठिन हो जाता है। कई स्थानों पर वायुमंडल का पतला होना भी उड़ान को प्रभावित करता है। इस दृष्टि से स्वच्छ वायु केवल पर्यावरणीय या स्वास्थ्य का नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा का भी प्रश्न है।
हम सबने कोविड महामारी के समय देखा कि जब Breathing Emergency की स्थिति पैदा होती है तो हालात किस प्रकार नियंत्रण से बाहर हो जाते हैं।
अब प्रश्न उठता है – एक जिम्मेदार नागरिक को क्या करना चाहिए?
वृक्षारोपण करना और हरित क्षेत्र बढ़ाना।
कचरे का उचित प्रबंधन करना।
इलेक्ट्रॉनिक वाहनों का अधिक उपयोग करना।
सौर ऊर्जा और नवीकरणीय स्रोतों को अपनाना।
स्थानीय भाषा में लोगों को जागरूक करना।
सबसे आवश्यक है कि लोग यह समझें कि स्वच्छ वायु से ही स्वस्थ जीवन, उत्पादकता और पर्यावरणीय संतुलन सम्भव है। जबकि प्रदूषित वायु फेफड़ों के रोग, हृदय रोग और अस्थमा जैसी जानलेवा बीमारियों को जन्म देती है। बच्चों और बुजुर्गों पर इसका प्रभाव और भी गहरा पड़ता है।
पृथ्वी के लिए यह संकट और भी बड़ा है, क्योंकि वायु प्रदूषण असामान्य जलवायु परिवर्तन को जन्म देता है, जैसे – ग्लेशियरों का पिघलना, समुद्र के स्तर का बढ़ना और मौसम का असंतुलन।
स्वच्छ वायु हमारा अधिकार है, परंतु इसके संरक्षण का कर्तव्य भी उतना ही हमारा है। भारतीय अध्यात्म में पृथ्वी ऋण का उल्लेख है – अर्थात् धरती से हमें जो मिला है, उसका ऋण हमें हरियाली और जीवन-संतुलन लौटाकर चुकाना होगा।
यदि हमने आज ठोस कदम न उठाए, तो आने वाली पीढ़ियाँ नीले आकाश को केवल पुस्तकों और कविताओं की पंक्तियों में ही पढ़ पाएँगी –
“नीले गगन के तले, पृथ्वी का प्यार पले।”
अतः हम सब – व्यक्ति, समाज, सरकार और राष्ट्र – मिलकर यह सुनिश्चित करें कि वायु स्वच्छ रहे, आकाश नीला रहे और पृथ्वी जीवनदायिनी बनी रहे।