- विंग कमांडर उमेंद्र त्रिपाठी
इस वर्ष नवंबर में बिहार में विधानसभा चुनाव होने जा रहे हैं। चुनाव हर पाँच वर्ष में होते हैं, ताकि जनता को यह अधिकार और अवसर मिल सके कि वे अपने प्रतिनिधियों को खुद चुनें — ऐसे प्रतिनिधि जो प्रदेश के विकास के लिए प्रतिबद्ध हों, और जनता की समस्याओं का समाधान करने में सक्षम हों।
बिहार हमेशा से लोकतंत्र की भूमि रहा है। दुनिया को “गणराज्य” और लोकतांत्रिक प्रणाली की शुरुआत इसी बिहार की पवित्र धरती, वैशाली से मिली थी। जहां “जनता के द्वारा, जनता के लिए, जनता का शासन” की अवधारणा को मूर्त रूप मिला। आज भी भारत सहित विश्व के कई देशों में लोकतंत्र की यही व्यवस्था अपनाई जाती है — अंतर सिर्फ इतना है कि कहीं बैलेट पेपर से वोट डाले जाते हैं, तो कहीं इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (EVM) का उपयोग होता है।
जब हम किसी चीज़ को चुनते हैं, तो हमारे निर्णय के पीछे कई कारक होते हैं। इसलिए ज़रूरी है कि हम चुनाव के समय अपने दिमाग में वे सारे मुद्दे और कारक स्पष्ट रखें, जो हमारे निर्णय को प्रभावित करते हैं। किसी नेता को चुनने का निर्णय भी कई राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक मुद्दों से प्रभावित होता है।
बिहार की समस्याएं जटिल हैं। आज भी राज्य को शिक्षा, स्वास्थ्य, रोज़गार, उद्योग, कला-संस्कृति, विरासत, आधारभूत ढांचे और सामाजिक समरसता के क्षेत्रों में बहुत कुछ हासिल करना बाकी है। साथ ही, जातिगत राजनीति की गहरी जड़ें आज भी हमारे सामाजिक ताने-बाने को बाँध कर रखे हुए हैं।
इसलिए, जब आप वोट डालने जाएं, तो सिर्फ जाति, धर्म या पार्टी नहीं — बल्कि मुद्दों को ध्यान में रखें। अपने प्रत्याशी का चयन इस आधार पर करें कि क्या वह व्यक्ति योग्य है? क्या उसके पास आपकी और राज्य की समस्याओं का समाधान है?
जब तक जनता खुद अपने मुद्दे तय नहीं करेगी, तब तक उनका समाधान असंभव है। इस बार का चुनाव बिहार के लिए ही नहीं, बल्कि पूरे देश के लिए एक मॉडल चुनाव बन सकता है — जहाँ:
हिंसा ना हो,
100% मतदान हो,
जाति और पार्टी की राजनीति से ऊपर उठकर,
सिर्फ जनहित के मुद्दों पर वोटिंग हो।
याद रखिए — आपका एक वोट सिर्फ एक संख्या नहीं, बल्कि बिहार की प्रगति में एक सशक्त क़दम हो सकता है।
आइए, इस चुनाव को एक नया इतिहास बनाने दें। जागरूक बनें, वोट करें, और बिहार को नई दिशा दें।