– अचला श्रीवास्तव
चांद सी शीतल, सूर्य का तेज हो तुम।
पर्वत सी अचल, सरिता का वेग हो तुम।।
कभी पुष्प सी कोमल, कभी पत्थर की कठोरता।
हर गुण अपनाती, नायिका हो तुम ।।
इस दुनिया में लाई हमें, जीवनदायनी हो तुम।
त्रिया बनी, संघर्ष किया, जीवनसंगिनी हो तुम।।
कभी बहन का दायित्व, कभी बेटी की चंचलता।
हर किरदार निभाती, नायिका हो तुम।।
“मैं” से “हम” बनाया, क्या खुद को कभी जान पाई तुम?
ज़िम्मेदारियों के बोझ तले, क्यों सवरना भूल गई तुम?
सबके सपने पूरे किए, कभी चैन की नींद सो पाई तुम?
सुंदर फूल की चाहत करो।
आसमान में आकृतियां बनाओ।।
देखो क्या है, उस समुद्र में।
पहाड़ के उस पार भी जाओ।।
निखरेगी तब लाली तुम्हारे गालों पे।
आंखों में तारे टिमटिमाएंगे ।।
खुले केशू घने बादल बनेंगे ।
होठों पर मुस्कान इंद्रधनुष कहलाएंगे।।
रखेंगे सब तुम्हे प्रेम की छांव में ।
तुम जीतोगी, हर दाव।।
वादा करो कभी निराश ना होगी तुम ।
तभी तो सब कहेंगे , नायिका हो तुम ।।