84 वर्षों बाद पुनर्जीवित हुआ आस्था का केंद्र – “दुखहरण नाथ शिव मंदिर”

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पटना जिले के अथमलगोला प्रखंड के अथमलगोला इंग्लिश गांव में स्थित दुखहरण नाथ शिव मंदिर आज श्रद्धा, आस्था और सामूहिक प्रयास का जीवंत उदाहरण बन चुका है। लगभग 84 वर्षों के बाद इस प्राचीन मंदिर का जीर्णोद्धार किया जा रहा है, जिसने पूरे क्षेत्र में धार्मिक उत्साह और सामाजिक एकता का नया संदेश दिया है। यह केवल एक मंदिर का पुनर्निर्माण नहीं है, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही आस्था का पुनर्जागरण है।

इस मंदिर की स्थापना की कहानी अपने आप में अत्यंत रोचक और प्रेरणादायक है। बुजुर्ग ग्रामीणों के अनुसार, संवत् 1999 (1942 ई.) में इस मंदिर की आधारशिला रखी गई थी। कहा जाता है कि गांव के भभीक्षण महतो ने एक दिन दुखहरण सिंह की जमीन पर एक शिव पिंडी बनाकर जलाभिषेक शुरू किया। धीरे-धीरे यह स्थान श्रद्धालुओं के लिए पूजा का केंद्र बन गया।

दुखहरण सिंह के पुत्र जयराम दास, जो निःसंतान थे, एक महात्मा के संपर्क में आकर वैराग्य जीवन अपनाने लगे। एक दिन उन्हें स्वप्न में संकेत मिला कि यदि वे शिव मंदिर का निर्माण कराते हैं, तो उनका जीवन सफल होगा। इस स्वप्न ने उनके जीवन की दिशा बदल दी और उन्होंने अपनी डेढ़ बीघा जमीन बेचकर उसी स्थान पर मंदिर का निर्माण करवाया, जहाँ शिव पिंडी स्थापित थी।

जयराम दास ने न केवल मंदिर का निर्माण कराया, बल्कि इसके रख-रखाव के लिए साढ़े तीन बीघा जमीन भी मंदिर के नाम कर दी। उन्होंने एक ट्रस्ट का गठन किया, जो मंदिर की देखभाल करता रहा। दुर्भाग्यवश, जिस स्थान पर वे वैराग्य जीवन व्यतीत कर रहे थे, वहीं उनकी नृशंस हत्या कर दी गई। उनकी मृत्यु के बाद मंदिर की देखभाल की जिम्मेदारी ग्रामीणों ने संभाली। वर्षों तक ग्रामीणों ने अपनी श्रद्धा और सहयोग से मंदिर को जीवित रखा, लेकिन समय के साथ मंदिर जर्जर अवस्था में पहुंच गया।

लगभग 84 वर्षों बाद जब मंदिर की स्थिति अत्यंत खराब हो गई, तब गांव के शिव भक्तों ने इसके पुनर्निर्माण का निर्णय लिया। ट्रस्टियों ने यह तय किया कि शिवलिंग को यथावत रखते हुए पूरे मंदिर ढांचे को नए सिरे से बनाया जाएगा। मंदिर की ऊंचाई 31 फीट से बढ़ाकर 51 फीट करने का निर्णय लिया गया। मंदिर के शिखर पर 6 फीट लंबा, नौ कलशों से सुसज्जित पीतल का त्रिशूल स्थापित किया गया है, जो इसकी भव्यता को और बढ़ाता है।

जीर्णोद्धार के दौरान मंदिर को आधुनिक स्वरूप देने पर विशेष ध्यान दिया गया है। मंदिर के अंदर श्वेत मकराना मार्बल से बनी नंदी, भगवान गणेश और कार्तिकेय की सुंदर मूर्तियां स्थापित की गई हैं। परिसर में श्रद्धालुओं के लिए सुविधाओं का भी विस्तार किया जा रहा है। अब तक इस जीर्णोद्धार कार्य में लगभग 12 लाख रुपये खर्च हो चुके हैं, जबकि 4 से 5 लाख रुपये और खर्च होने का अनुमान है। यह कार्य पूरी तरह से जनसहयोग और श्रद्धालुओं के दान से संभव हो पाया है।

इस भव्य कार्य में गांव के अनेक लोगों ने अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। विशुद्धानंद शर्मा, वेद प्रकाश शर्मा और गुंजन कुमार ने दान एकत्र करने में सक्रिय योगदान दिया। वहीं रंतिदेव शर्मा ने मंदिर के अंदर लगने वाले टाइल्स का पूरा खर्च वहन किया।

तिलोत्तमा देवी, प्रवीण कुमारी, सुशांत कुमार, ऋषिराज, दीपक कुमार और प्रखंड प्रमुख प्रतिनिधि राजकिशोर सहित अनेक ग्रामीणों ने आर्थिक और श्रमदान के माध्यम से इस कार्य को सफल बनाया। यह मंदिर अब केवल पूजा का स्थान नहीं, बल्कि सामूहिक एकता और समर्पण का प्रतीक बन गया है।

मंदिर में हर वर्ष चैत्र कृष्ण पक्ष त्रयोदशी को स्थापना दिवस बड़े धूमधाम से मनाया जाता है। इस अवसर पर 24 घंटे का अष्टयाम, भजन-कीर्तन, राम कथा और भंडारा आयोजित किया जाता है। इस वर्ष भी 16 मार्च को अष्टयाम का आयोजन हुआ और 17 मार्च को समापन के बाद भंडारा आयोजित किया गया, जिसमें 101 ब्राह्मणों सहित लगभग 250 लोगों ने प्रसाद ग्रहण किया। 18 मार्च से नौ दिवसीय राम कथा का आयोजन भी प्रारंभ किया गया, जिससे पूरा गांव भक्तिमय वातावरण में डूब गया।

दुखहरण नाथ शिव मंदिर का जीर्णोद्धार केवल एक धार्मिक स्थल के पुनर्निर्माण की कहानी नहीं है, बल्कि यह आस्था, त्याग, समर्पण और सामूहिक प्रयास का अद्भुत उदाहरण है। यह मंदिर आज भी यह संदेश देता है कि जब समाज एकजुट होकर किसी कार्य के लिए संकल्प लेता है, तो कोई भी लक्ष्य असंभव नहीं रहता। आने वाले समय में यह मंदिर न केवल श्रद्धालुओं के लिए आस्था का केंद्र बनेगा, बल्कि क्षेत्र की सांस्कृतिक और सामाजिक पहचान को भी नई ऊंचाइयों तक पहुंचाएगा।

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