स्वाधीनता संग्राम में महिलाओं की भूमिका

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  • ज्योति झा*

इतिहास साक्षी रहा है कि निरंतर घुटन के असह्य अनुभव से ही विद्रोह उत्पन्न हुआ है, फिर चाहे वो अनीतियों के विरुद्ध हो, अन्यायों के विरोध में हो, या फिर सत्ता के ही प्रतिकूल क्यों न हो। और जहां घुटन के असह्य अनुभव का ज़िक्र हो, तो वहाँ स्त्रियों का संदर्भ तो जैसे स्वाभाविक है। सृजन की शक्ति दर्शाने वाली स्त्री सदियों से दमन से ग्रस्त रही है, और उससे श्रेष्ठकर कौन होगा पराधीनता के अन्याय का दुःख समझने वाला। और शायद इसलिए भारतीय इतिहास के गौरवपूर्ण अध्यायों के निर्माण में स्त्रियों का सहयोग अद्भुत रहा है, फिर चाहे वो स्वाधीनता संग्राम परिच्छेद ही क्यों न हो।

आदिकाल से ही स्त्री शक्ति की प्रतिष्ठा का वर्णन रहा जब असुरों को नष्ट करने के लिए दैवी शक्ति का आश्रय लिया गया। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में भी आक्रमणकारियों के विरुद्ध, स्त्री सदैव अपनी शक्ति प्रदर्शित करती हुई अग्रणी रही है। अंग्रेज़ी शासन के दौरान भारतीय स्वाधीनता संग्राम कई दौरों से होकर गुजरा जिसमें कई वीरांगनाओं ने अपना उल्लेखनीय योगदान प्रदर्शित किया। 1857 के विद्रोह में जहां वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई का अद्भुत शौर्यपूर्ण योगदान रहा, वहीं बेगम हज़रत महल का साहसिक एवं उल्लेखनीय उदाहरण था। जिस प्रकार आज़ादी की जंग में स्त्री और पुरुष के योगदान में समानता रही, उसी प्रकार यह संग्राम किसी धर्म, जाती, या वर्ण में सीमित नहीं था। महिलाओं का जहां तक सवाल था, तो उसमें रानियाँ, बेगमें, वीरांगनाएँ आदि से लेकर बाँदियाँ, तवायफ़ें सभी सम्मिलित थीं जो की शिक्षित- अशिक्षित, अमीरी- ग़रीबी, एवं सवर्ण- दलित सभी श्रेणियों में व्याप्त थीं।

ऐसा ही एक नाम था झाँसी की रानी की सेविका झलकारीबाई का जो कि इतिहास के पन्नों में खो गया था और दलित आंदोलन के विकास के बाद उभर कर सामने आया। एक साधारण सैनिक की पत्नी, झलकारीबाई मल्लयुद्ध, घुड़सवारी, तलवारबाज़ी, बंदूक़ चलाने में प्रशिक्षित थी और अपने कौशल से उसने महारानी लक्ष्मीबाई के ‘दुर्गादल’ की ज़िम्मेदारी हासिल कर ली थी। अंग्रेजों के ख़िलाफ़ उसने बहादुरी से लड़ाई लड़ी थी। इतिहास के इन्ही पन्नों से एक और नाम उभरकर आता है ऊदादेवी का जो कि दलित समाज की पासी महिला थी। ऊदादेवी ने लखनऊ में ब्रिटिश सेना को कड़ी टक्कर दी थी। इन वीरांगनाओं में एक और नाम जुड़ा महावीरी देवी का जो कि भगी जाति की थी और मुज़फ़्फ़रनगर की रहने वाली थी। उसने अपने पराक्रम और बुद्धि से महिलाओं एवं बच्चों का संगठन बनाया था और इसी संगठन की बाईस महिलाओं के साथ मुज़फ़्फ़रनगर में ब्रिटिश हमले के विरुद्ध वीरता से सामना किया था। मुज़फ़्फ़रनगर की एक और महिला आशा देवी गूजर ने भी युद्ध में अपना पराक्रम दिखाया और विद्रोह के जुर्म में फाँसी पर चढ़ा दी गई। वाल्मीकि देवी, भगवती देवी, कौशल देवी, सहेजा वाल्मीकि, रहीमी गुर्जर, हबीब गुर्जरी जैसे अन्य कई नाम थे जो स्वतंत्रता संग्राम के परिच्छेद में अदृश्य हो गए थे परंतु उन्हें दलित आंदोलन, महिला आंदोलन के पश्चात आई जागरूकता के बाद प्रकाश में लाया गया।

आज़ादी के इस महा संग्राम के कई प्रसंगों एवं दस्तावेज़ों में महिलाओं की बहादुरी और देशप्रेम की झलक मिलती है कुछ और नामों में, जैसे कि, तुलसीपुर की रानी रजेश्वरी और नाना साहेब की बेटी मैनावती, जो इस युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुईँ। बेगमों, रानियों, दलितों के समक्ष एक और तबका है जो वीरता से इस संग्राम का हिस्सा बना रहा अपने हौसले और देशप्रेम की भावना से, और वो तबका है तवायफ़ों का जिनका संघर्ष अविस्मरणीय रहा। अजीजुननिसा का नाम इसमें सर्वोपरि है जिसने अपने साहस की एक मिसाल प्रस्तुत की। 1857 के संग्राम में उन्होंने अपने अद्वितीय शैली में भागीदारी दिखाई चाहे वो युद्ध में घायल लोगों की सेवा हो या फिर महफ़िलों में केवल देशभक्ति के गीत गाने की सौगंध।

गांधीजी के नेतृत्व में उदित स्वतंत्रता आंदोलन में भी असंख्य महिलाओं ने भागीदारी प्रदर्शित की जो कि भारतीय संविधान में स्त्री- पुरुष के समक्ष समानता का एक ठोस आधार भी तैयार करने में सहायक रहा। कस्तूरबा गांधी, दुर्ग़ाबाई देशमुख, सरोजिनी नायडू, कमला देवी चटोपाध्याय, हंसा मेहता, कमला नेहरू, अवंतिका बाई गोखले, सरला देवी, पार्वती बाई आदि कई नाम हैं जिन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में सक्रीय हिस्सा लिया और राष्ट्रीय आंदोलन को जन आंदोलन में परिवर्तित करने में सहभागिता दिखाई। शांतिपूर्ण आंदोलन हो या क्रांतिकारी गतिविधियाँ, इन वीरांगनाओं का हौसला कभी विचलित नहीं हुआ। ब्रिटिश शासन के विरुद्ध तीखी प्रतिक्रिया एवं गतिविधियों से इन महिलाओं ने यह सिद्ध कर दिया कि इस राष्ट्रचेतना में स्त्री शक्ति भी एक शक्ति है जो स्वाधीनता के लिए उन्मुक्त होकर संघर्षरत हो सकती है।

सरदार भगत सिंह की भाभी दुर्गा भाभी, बीना दास, शांति घोष, सुनीति चौधरी, प्रीतिलता, कैप्टन लक्ष्मी जैसे कई नाम हैं जो गांधीवाद आंदोलन के अलावा हथियार बंद आंदोलन का हिस्सा रहे। सुभाषचंद्र बोस द्वारा रचित महिला सैनिकों का दल रानी झाँसी रेजिमेंट भारत से बाहर रहकर भी देश के स्वतंत्रता संग्राम में सक्रियता से भाग लेता रहा।
पारिवारिक स्तर पर आकलन किया जाए तो विविध आयामों के साथ महिलाओं ने अपनी हिस्सेदारी दिखाई जो देश कि आज़ादी के इतिहास में कहीं न कहीं दर्ज हो गया। नागालैंड की रानी गिडयालू तेरह वर्ष की उम्र में ही इस संग्राम का हिस्सा बन गई और इस महासंग्राम में उत्तर-पूर्व भारत की महिलाओं के योगदान का प्रतीक बन गई। स्वतंत्रता संग्राम के गौरवशाली इतिहास के इन्ही पन्नों में रानी सत्यवती के संस्मरणों का ज़िक्र भी प्रभावशाली है। इस सतत संघर्ष में घर, परिवार, समाज, और स्वयं की लड़ाई से सर्वोपरि इस स्वाधीनता संग्राम को अपना उद्देश्य बनाकर अपने प्राणों की आहुति दे, इन महिलाओं ने अविस्मरणीय एवं अद्भुत साहस दिखाया।

जहां कई नाम उजागर हैं वहीं अनगिनत नाम या तो गुमनामी के अंधेरों में खो गए, और कुछ धीरे-धीरे उबर रहे हैं। नाम चाहे स्वर्णाक्षर में अंकित हों या फिर हमारे मानस-पटल के झरोखों में क़ैद, इतिहास के पन्नों में गुम हों या फिर स्वतः उभरकर अपनी कहानी दर्ज करती उम्मीदें, इन्हें याद कर हम अपना सर गर्व से ऊँचा रखते हैं, उनके संग्राम के आयामों को समझने का प्रयास करते हैं, उनके त्याग एवं बलिदान को नमन करते हैं, और उनके हौसले को आत्मसार कर एक नई रोशनी की ओर कदम बढ़ाते हैं।

नाम चाहे जो भी हों, पहचान कोई भी हो, हौसला और जज़्बा एक ही रहा- आज़ादी की लड़ाई में बराबर हिस्सेदारी। ये क्रांतिकारी स्वतंत्रता संग्राम की नींव के वे मज़बूत पत्थर हैं जो हमेशा हमें गौरवान्वित करेंगे, प्रेरित करेंगे।

“तेरा स्मारक तू ही होगी, तू खुद अमिट निशानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी”
– सुभद्रा कुमारी चौहान

*(लेखक, ज्योति झा सुप्रसिद्ध लेखिका एवं कॉलम्निस्ट हैं)

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