राधा अष्टमी : भक्ति, प्रेम और शक्ति का उत्सव है। श्रीहरि ज्योतिष, पटना के संस्थापक पंडित अवधेश झा से कंचन चौधरी की विशेष बातचीत

कंचन: राधा अष्टमी क्या है?
पंडित अवधेश झा: राधा अष्टमी भाद्रपद शुक्ल पक्ष की अष्टमी को मनाई जाती है। यह श्री राधा जी का प्राकट्य दिवस है।
ब्रह्मवैवर्त पुराण में उल्लेख है—
“राधा नाम्नी तु या शक्ति: परं ब्रह्म स्वरूपिणी।
सा प्रादुर्भूता लोकेऽस्मिन् कृष्णप्राणाधिका सदा॥”
अर्थात, राधा शक्ति स्वरूपा हैं, जो भगवान श्रीकृष्ण से भी अधिक प्रिय हैं। इस दृष्टि से राधा अष्टमी केवल जन्मोत्सव ही नहीं, बल्कि शक्ति और भक्ति के प्राकट्य का पर्व है।
कंचन: राधा अष्टमी का धार्मिक और ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
पंडित अवधेश झा: धार्मिक दृष्टि से राधा जी भगवान श्रीकृष्ण की ह्लादिनी शक्ति (आनंद प्रदायिनी शक्ति) मानी जाती हैं।
श्रीमद्भागवत महापुराण (10.30.28) में गोपियों की प्रार्थना आती है—
“अनया राधिकेनोऽयं हरिर्गोविन्द ईश्वरः।
अन्वीयतेऽनया वृन्दां यद्विनोदपदीक्षणः॥”
अर्थात, राधिका ने अपने प्रेम से स्वयं भगवान को भी अपने वश में कर लिया है।
ऐतिहासिक दृष्टि से यह उत्सव प्राचीन काल से विशेष रूप से ब्रजभूमि—बरसाना, वृंदावन और नंदगांव में मनाया जाता रहा है। आज भी ब्रज में इसकी अनुपम छटा देखने को मिलती है और विश्वभर में इस्कॉन मंदिरों में इसे बड़े उत्साह से मनाया जाता है।

कंचन: राधा अष्टमी का आधुनिक समाज पर क्या प्रभाव है?
पंडित अवधेश झा: राधा जी करुणा, समर्पण और निष्काम भक्ति की प्रतीक हैं। आज के भौतिकवादी युग में उनका संदेश अत्यंत प्रासंगिक है।
श्रीमद्भगवद्गीता (9.34) का “मन्मना भव मद्भक्तः” उनके जीवन में प्रत्यक्ष रूप से प्रकट होता है। राधा जी की पूजा से समाज में स्त्री का सम्मान, भक्ति का महत्व और प्रकृति के प्रति प्रेम जागृत होता है।
कंचन: राधा अष्टमी का ब्रज क्षेत्र से क्या संबंध है?
पंडित अवधेश झा: राधा जी का प्राकट्य स्थान बरसाना ब्रजमंडल का हृदय है।
पद्मपुराण में कहा गया है—
“यत्र यत्र स्थिता राधा तत्र तत्र स्थितो हरिः।
यत्र नास्ति ततो राधा नास्ति तत्र जनार्दनः॥”
अर्थात जहाँ राधा हैं, वहाँ कृष्ण हैं; और जहाँ राधा नहीं, वहाँ कृष्ण भी नहीं।
इसी कारण ब्रज क्षेत्र में राधा अष्टमी का विशेष महत्व है। यहाँ मेले, झूलन उत्सव, भजन-कीर्तन और विविध आध्यात्मिक आयोजन होते हैं।
कंचन: बरसाने में राधा अष्टमी कैसे मनाई जाती है?
पंडित अवधेश झा: बरसाने के श्रीलाड़ली जी मंदिर में यह दिन अत्यंत भव्य रूप से मनाया जाता है। शोभायात्रा निकलती है, 56 भोग अर्पित किए जाते हैं और विविध झांकियाँ सजाई जाती हैं। अखंड कीर्तन और रस-लीला का विशेष आयोजन होता है।
गर्ग संहिता में उल्लेख है—
“राधारमणस्य यो जन्मोत्सवः श्रद्धया नरः।
पश्यत्यर्चयते भक्त्या स याति परमां गतिम्॥”
अर्थात जो श्रद्धा से राधा जन्मोत्सव का दर्शन करता है और भक्तिपूर्वक पूजा करता है, वह परम गति को प्राप्त करता है।
अंत में, राधा जी की स्तुति की जाती है—
“रासेश्वरि नमस्तेऽस्तु कृष्ण प्राणाधिकप्रिये।
नमस्त्रैलोक्यजननि प्रसीद करुणार्णवे॥”
हे रास-मंडल की अधिष्ठात्री परमेश्वरी! आपको नमस्कार है।
हे श्रीकृष्ण को प्राणों से भी अधिक प्रिय रासेश्वरि! आपको प्रणाम है।
हे त्रैलोक्य की जननी और करुणा-सागर! मुझ पर कृपा कीजिए।
