लेखक – अवधेश झा
मिथिला भूमि—भारतीय संस्कृति का अमर केंद्र, जहाँ जीवन और साधना, कर्म और श्रद्धा, लोक और वेद एकात्म रूप में विद्यमान हैं। इस भूमि पर मनाया जाने वाला छठि पाबनि केवल एक पर्व जोकि प्रकृति, कृषि जीवन और आस्था का त्रिवेणी-संगम है। यह पर्व अपने भीतर वैदिक सूर्योपासना, मातृत्व की करुणा, और लोकजीवन की सादगी का अद्भुत समन्वय समेटे हुए है। गंगा नदी के तट पर, बिहार की राजधानी पटना में होने वाले छठ महापर्व विश्वप्रसिद्ध है। जबकि मैथिली के घर – घर में छठ की परंपरा रही है, इस समय प्रत्येक गांव, टोला, नदी, तालाब आदि स्वच्छ बनाया जाता है। यह महापर्व पूर्वांचल, भारत के कई प्रसिद्ध स्थान तथा विश्व के कई देशों में भी मनाया जाता है।
छठि पाबनि लोक और वेद का संगम है। ऋग्वेद में स्पष्ट उल्लेख है।
“सप्ताश्वं रथमास्थितं प्रभग्नं त्वष्टा पुनर्निमिमीत”
— ऋग्वेद 1.50.8
सूर्योपासना भारतीय परम्परा का आदि स्रोत है। छठि पाबनि में षष्ठी देवी और सूर्यदेव की संयुक्त आराधना होती है। षष्ठी तिथि को सायंकालीन अर्घ्य षष्ठिका देवी—बालरक्षा की अधिष्ठात्री—के निमित्त अर्पित किया जाता है, जबकि सप्तमी तिथि को प्रातःकालीन अर्घ्य उदीयमान सूर्य को दिया जाता है।
“षष्ठ्याः पूजां नरो यः कुर्याद् भक्त्या समाहितः।
स बालानां रक्षां लभेत् आयुर्धनसमृद्धिम्॥”
— मार्कण्डेय पुराण
अर्थात्—जो व्यक्ति षष्ठी देवी की भक्तिपूर्वक पूजा करता है, वह बालकों की रक्षा, दीर्घायु और समृद्धि प्राप्त करता है।
कृषिजीवन और अन्नसंस्कृति का उत्सव है यह महापर्व। छठ पर्व भारत के कृषिप्रधान समाज की आत्मा को प्रकट करता है। खरना के दिन गन्ना, चावल और गुड़ से बनी खीर का प्रसाद ग्रहण किया जाता है—यह अन्नपूर्णा की उपासना है।
“अन्नं वै प्राणाः। अन्नाद् भवति भूतानि॥”
— तैत्तिरीयोपनिषद् (अन्नवल्ली)
अन्न से ही जीवन की उत्पत्ति और पोषण होता है—छठ का व्रत इसी सत्य को आत्मसात् करता है। भूसबा नामक प्रसाद का विशेष महत्त्व है, जो “गम्हरि धान” से तैयार किया जाता है—यह धान गर्भावस्था में ही पक जाता है, जो मातृत्व और सृजन के प्रतीक षष्ठी देवी से गहराई से जुड़ता है।
फल, पर्यावरण और ऋतुचेतना, जोकि छठ में चढ़ाए जाने वाले पाँच प्रमुख फल—कुसियार (गन्ना), डाभ (नारियल), नेबो (नींबू), सिंहारा (जलफल) और केरा (केला)—सभी अपने-अपने पर्यावरणीय और जलवायु संकेतों के प्रतीक हैं। ये फल ऋतु-परिवर्तन के सजीव द्योतक हैं, जो प्रकृति और मानव जीवन के समन्वय का संदेश देते हैं।
“ऋतं च सत्यं चाभीद्धात् तपसोऽध्यजायत।
ततो रात्र्यजायत ततः समुद्रोऽर्णवः॥”
— ऋग्वेद 10.190.1
ऋतु और सत्य से ही जगत का संचालन है—छठ पर्व इन्हीं दोनों के संतुलन का उत्सव है।
बाँस का उपकरण : श्रम और सौन्दर्य का प्रतीक है। छठि पाबनि में बाँस से बने पथिया, सूप, मौनी, डाली आदि उपकरणों का उपयोग होता है। बाँस भारतीय कृषिजीवन का अभिन्न अंग है—यह श्रम, सादगी और आत्मनिर्भरता का प्रतीक है। बाँस के उपकरण बनाना अगहनी फसल की तैयारी का संकेत भी है—यह पर्व कर्मयोग और शिल्प-संस्कृति दोनों का उत्सव है।
“कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।”
— भगवद्गीता 2.47
छठ का प्रत्येक वस्तु और पदार्थ कर्मयोग की स्मृति जगाता है।
स्नान, अर्घ्य और स्वास्थ्य परम्परा है। संध्या और प्रातः अर्घ्य से पूर्व सरोवर या नदी में स्नान का विधान है। बदलते तापमान के साथ यह स्नान धार्मिक और वैज्ञानिक दृष्टि से भी स्वास्थ्यवर्धक है।
“आपो हि ष्ठा मयोभुवाः ता न ऊर्जे दधातन॥”
— ऋग्वेद 10.9.1
जल ही जीवन का स्रोत है—यह शरीर और आत्मा दोनों को पवित्र करता है। छठि पाबनि में यह जलोपासना अपने चरम रूप में प्रकट होती है।
स्त्रीशक्ति और लोकश्रद्धा का पर्व है। छठि पाबनि में किसी पुरोहित की आवश्यकता नहीं होती। यह स्त्रीशक्ति की स्वायत्त पूजा परम्परा है, जहाँ प्रत्येक नारी स्वयं पुरोहिता बन जाती है। व्रत, उपवास, स्वच्छता और संयम—इन सबके माध्यम से यह पर्व नारी के आध्यात्मिक और सामाजिक सामर्थ्य को उद्घाटित करता है।
“यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः॥”
— मनुस्मृति 3.56
विश्व-संस्कृति में मिथिला का योगदान सदा से रहा है। छठि पाबनि केवल मिथिला का नहीं, सम्पूर्ण भारतवर्ष का लोकवैदिक उत्सव है—जहाँ सूर्य की तेजस्विता, जल की पवित्रता, अन्न की समृद्धि और नारी की शक्ति मिलकर जीवन की पूर्णता का प्रतीक बन जाते हैं। मिथिला की यह परम्परा विश्व-सांस्कृतिक धरोहर है—जहाँ लोक और वेद, प्रकृति और पुरुष, श्रद्धा और विज्ञान—सभी का संगम होता है।
“सूर्यो वा एष आत्मा जगतः स्थूलस्य च सूक्ष्मस्य च॥”
— छान्दोग्य उपनिषद् 3.19.1
सूर्य ही स्थूल और सूक्ष्म जगत् का आत्मा है—छठ पर्व उसी आत्मा के प्रति अर्पित एक सामूहिक प्रणाम है। मिथिला की छठि पाबनि—लोक और वेद का संवाद, अन्न और अध्यात्म का संगम, नारी और प्रकृति की एकात्मता, तथा भारतीय जीवन के शाश्वत मूल्यों का जीवंत उत्सव है।
यह पर्व भारत के साथ सम्पूर्ण मानवता की अमूल्य सांस्कृतिक विरासत है—एक ऐसा प्रकाश, जो सूर्य की भाँति सर्वव्यापी, शीतल और जीवनदायी है।