मैथिली अकादमी: भाषा संरक्षण राष्ट्रीय दायित्व

Art and culture

लेखक: अवधेश झा

मैथिली भाषा भारत के संविधान की अष्टम अनुसूची में सम्मिलित है। यह केवल एक भाषायी मान्यता नहीं, बल्कि भारत की प्राचीन सांस्कृतिक, दार्शनिक और बौद्धिक परंपरा की स्वीकृति है। ऐसी स्थिति में मैथिली से जुड़ी अकादमी या संस्थाओं का निष्क्रिय होना या बंद होना केवल एक प्रशासनिक समस्या नहीं, बल्कि करोड़ों मैथिल भाषियों के सांस्कृतिक अधिकारों और बौद्धिक भविष्य पर सीधा आघात है। भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं होती, वह समाज की स्मृति, आत्मा और चेतना होती है।

भारतीय शास्त्र परंपरा में भाषा को दिव्य तत्व माना गया है। ऋग्वेद में वाणी को देवी रूप में प्रतिष्ठित किया गया है:
“वाग्वै विश्वा भुवनानि जज्ञे”
(ऋग्वेद 10.125)
अर्थात् वाणी ही समस्त जगत की सर्जक है। भाषा के बिना ज्ञान का संप्रेषण, संस्कृति का प्रवाह और सभ्यता का विकास असंभव है।

तैत्तिरीय उपनिषद में कहा गया है:
“सत्यं वद। धर्मं चर।”
यह उपदेश भाषा के माध्यम से ही पीढ़ी-दर-पीढ़ी समाज में प्रवाहित हुआ। अतः भाषा का संरक्षण धर्म और सत्य के संरक्षण के समान ही आवश्यक है।

मातृभाषा और ज्ञान परंपरा के संबंध में महाभाष्यकार पतंजलि कहते हैं कि भाषा लोक की आत्मा होती है। शिक्षा और ज्ञान का वास्तविक विस्तार तभी संभव है जब वह मातृभाषा में हो। इसी भाव को आधुनिक संदर्भ में महात्मा गांधी ने भी स्वीकार किया था कि मातृभाषा में शिक्षा व्यक्ति को आत्मनिर्भर और समाज को सशक्त बनाती है।

मैथिली भाषा में विद्यापति, उमानाथ झा, हरिमोहन झा जैसे महान साहित्यकारों ने दर्शन, भक्ति, नीति और लोकजीवन को अभिव्यक्त किया। यह परंपरा स्वयं में एक जीवित शास्त्र है।

मैथिली अकादमी का महत्व बहुत महत्व है। मैथिली अकादमी केवल एक कार्यालय नहीं है। यह— भाषा शोध का केंद्र, साहित्य सृजन का मंच, शिक्षकों, विद्यार्थियों और साहित्यकारों का आश्रय और भावी पीढ़ी के लिए सांस्कृतिक सेतु है।

शास्त्रों में कहा गया है:
“नास्ति विद्यासमं चक्षुः”
(महाभारत)

यदि भाषा आधारित संस्थाएं ही नष्ट हो जाएँगी, तो ज्ञान-दृष्टि भी क्षीण होती जाएगी। इसलिए, अकादमी का बंद होना, संवैधानिक और नैतिक प्रश्न है।संविधान द्वारा मान्यता प्राप्त भाषा के लिए संस्थागत ढांचे का अभाव, संवैधानिक भावना के विपरीत है। यह केवल मैथिली का प्रश्न नहीं, बल्कि भारत की भाषाई विविधता और संघीय संस्कृति का प्रश्न है।

जहाँ भाषा और संस्कृति का सम्मान होता है, वहीं राष्ट्र की आत्मा सुरक्षित रहती है, क्योंकि भारत केवल एक भौगोलिक इकाई नहीं, बल्कि भाषाओं का महासंगम है। प्रत्येक भाषा राष्ट्र की धरोहर है। मैथिली जैसी प्राचीन और समृद्ध भाषा का संरक्षण सरकार का अनुग्रह नहीं, बल्कि राष्ट्रीय दायित्व है।

भगवद्गीता में कर्मयोग का संदेश है:
“स्वधर्मे निधनं श्रेयः”
राष्ट्र का स्वधर्म है—अपनी भाषाओं, संस्कृतियों और लोकपरंपराओं की रक्षा।

मैथिली अकादमी का सशक्त, सक्रिय और निरंतर संचालन समय की अनिवार्यता है। यह केवल मैथिल समाज की मांग नहीं, बल्कि भारत की बहुभाषी आत्मा की रक्षा का प्रश्न है। यदि भाषा बचेगी, तो संस्कृति बचेगी; यदि संस्कृति बचेगी, तो राष्ट्र की चेतना जीवित रहेगी।

अतः मैथिली अकादमी का पुनर्जीवन और सशक्तिकरण—एक सांस्कृतिक आवश्यकता के साथ एक राष्ट्रीय दायित्व है।

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