लेखक: अवधेश झा
शिवरात्रि महापर्व ज्ञान और अनंत की यात्रा है। यह वह रात्रि है जब मनुष्य बाह्य जगत् के कोलाहल से निवृत्त होकर अपने भीतर के शिवतत्त्व का साक्षात्कार करता है। प्रायः हम शिवरात्रि में व्रत, उपवास, रुद्राभिषेक और रात्रिजागरण तो करते हैं, लेकिन यह शिवदर्शी बनने का भी दिन है। उपनिषदों की वाणी हमें स्मरण कराती है कि शिव की सच्ची पूजा आत्मबोध से संपन्न होती है।
शिव — अद्वितीय ब्रह्म
उपनिषदों में शिव का तात्त्विक स्वरूप ब्रह्म के रूप में प्रतिपादित है। श्वेताश्वतर उपनिषद् उद्घोष करता है—
“एको हि रुद्रो न द्वितीयाय तस्थुः।” (श्वेताश्वतर उपनिषद् ३.२)
अर्थात् वह एक ही रुद्र है, उसके अतिरिक्त दूसरा कोई नहीं। यही अद्वैत सत्य है। शिव समस्त चराचर जगत् के अधिष्ठाता चेतन तत्त्व हैं। जब हम शिवरात्रि में “ॐ नमः शिवाय” का जप करते हैं, तो वस्तुतः हम उसी अखंड ब्रह्मतत्त्व को प्रणाम कर रहे होते हैं। जो निराकार है।
बृहदारण्यक उपनिषद् कहता है—
“अहं ब्रह्मास्मि।” और छान्दोग्य उपनिषद् में महावाक्य है— “तत्त्वमसि।”
ये दोनों वाक्य हमें स्मरण कराते हैं कि शिव बाहर नहीं, भीतर हैं। शिवदर्शी होना अर्थात् इस सत्य का अनुभव करना कि जो परम तत्त्व है, वही मेरा वास्तविक स्वरूप है। हम वही हैं।
शिवरात्रि — अज्ञान से ज्ञान की यात्रा है। ‘रात्रि’ शब्द भौतिक अंधकार का द्योतक नहीं है, अपितु अज्ञान का प्रतीक है। कठोपनिषद् में यमराज नचिकेता से कहते हैं— “उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत।”
उठो, जागो और श्रेष्ठ ज्ञानी पुरुषों के समीप जाकर आत्मज्ञान प्राप्त करो।
शिवरात्रि का जागरण इसी आह्वान का प्रतीक है। यह जागरण चेतना का उत्सव है। जब मनुष्य अज्ञानरूपी रात्रि में भी शिवनाम का दीप प्रज्वलित रखता है, तब उसके भीतर का तम धीरे-धीरे विलीन होने लगता है।
शिवलिंग — निराकार का प्रतीक
उपनिषदों में ब्रह्म को निराकार, निरुपाधिक और अनन्त कहा गया है—
“नेति नेति।” (बृहदारण्यक उपनिषद्)
शिवलिंग उसी निराकार तत्त्व का प्रतीक है। यह न पुरुष है, न स्त्री; न आरंभ, न अंत। यह अनन्त चेतना का प्रतीक है। अतः शिवरात्रि में शिवलिंग का अभिषेक करते समय हमें यह भाव रखना चाहिए कि हम अपने ही अंतःकरण को पवित्र कर, उस परमतत्व से जुड़ रहे हैं। दूध, जल, बेलपत्र—ये सब बाह्य अर्पण हैं; किंतु सच्चा अर्पण है अहंकार का विसर्जन। ‘मैं’ को शिव में विसर्जित कर शिवत्व प्राप्त कीजिए।
मौन और ध्यान — शिव की वास्तविक आराधना
माण्डूक्य उपनिषद् ‘ॐ’ के माध्यम से चतुर्थ अवस्था ‘तुरिय’ का वर्णन करता है— “अमात्रश्चतुर्थोऽव्यवहार्यः प्रपञ्चोपशमः शिवोऽद्वैतः।”
यहाँ ‘शिव’ शब्द स्वयं ब्रह्म के पर्याय रूप में प्रयुक्त हुआ है—जो अद्वैत है, प्रपंच का उपशम है, वही शिव है। अतः शिवरात्रि में मौन, ध्यान और जप के द्वारा ‘तुरिय’ अवस्था की झलक पाना ही सच्ची उपासना है।
शिवदर्शी बनना — जीवन का साध्य
शिवदर्शी वह है जो समस्त प्राणियों में उसी चेतन तत्त्व का दर्शन करता है। ईशावास्योपनिषद् कहता है—“ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्।”
जब यह भाव जाग्रत हो जाता है कि समस्त जगत् शिवमय है, तब पूजा प्रत्येक कर्म, प्रत्येक श्वास पूजा बन जाती है। शिवरात्रि हमें यही सिखाती है कि शिव को प्रत्येक प्राणी में, प्रत्येक अंश में देखो। करुणा, क्षमा, समता और वैराग्य—ये ही शिव के वास्तविक गुण हैं।
शिवरात्रि में शिवदर्शी होकर पूजा कीजिए। उपनिषदों की वाणी हमें आह्वान करती है कि हम शिव की तत्वज्ञान, आत्मज्ञान की ओर अग्रसर हों। जब भीतर का अंधकार मिटेगा, तभी वास्तविक शिवरात्रि घटित होगी। अपने भीतर शिवत्व को पहचानिए।
“शिवोऽहम्।”