- अमृता राज
लड़की हो तुम, थोड़ा लिहाज़ करो —
बचपन से यही आवाज़ सुनती आई हूँ।
अपने सपनों को चुपके से दिल में दबाकर,
दूसरों की ख़ुशी में ही मुस्कुराती आई हूँ।
आँसू भी पोंछे हैं हँसकर कई बार,
ताकि “लोग क्या कहेंगे” ये सवाल ना उठे हर बार।
कभी बेटी, कभी बहू, कभी पत्नी का नाम मिला,
पर मेरा अपना वजूद कब मुझे सम्मान मिला?
हर बार कसौटी पर ही क्यों परखी जाती हूँ,
हर रिश्ते में खुद को क्यों भूल जाती हूँ?
क्या औरत होना ही मेरी ख़ता बन गई,
या मेरी खामोशी ही सबकी अदा बन गई?
द्रौपदी की पीड़ा आज भी इतिहास में रोती है,
सभा में बैठी भीड़ आज भी खामोश होती है।
वो प्रश्न आज भी हवा में तैर रहा है —
क्या नारी का सम्मान इतना सस्ता है?
कब तक उसे वस्तु समझकर आँका जाएगा,
कब तक उसका आत्मसम्मान यूँ ही जलाया जाएगा?
मैं औरत हूँ – शक्ति भी हूँ, सृजन की आधार भी हूँ।
ममता की धारा हूँ, साहस का विस्तार भी हूँ।
त्याग की प्रतिमा हूँ, पर अब मौन नहीं रहूँगी,
अपने अधिकारों के लिए अब डटकर कहूँगी।
सम्मान मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है कोई उपकार नहीं,
मेरी पहचान किसी रिश्ते की मोहताज नहीं।
अब समय है सोच बदलने का,
नारी को बराबरी का दर्जा देने का।
जिस दिन सम्मान हर नारी का अधिकार बनेगा ×2
उसी दिन सच्चे अर्थों में समाज महान बनेगा।