लेखक – अवधेश झा
दीपावली के बाद मनाया जाने वाला गोवर्धन पूजा का पर्व भारतीय संस्कृति में अत्यंत पवित्र और अर्थपूर्ण स्थान रखता है। यह केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि मानव, प्रकृति और परमात्मा के मध्य संतुलन एवं कृतज्ञता का उत्सव है। इसका मूल आधार ‘प्रकृति उपासना’ और ‘कृषि संस्कृति’ में निहित है।
गोवर्धन पूजा का उल्लेख वेदों और पुराणों में मिलता है। ऋग्वेद और अथर्ववेद में ‘गौ’ (गाय) तथा ‘पृथ्वी’ की स्तुति की गई है। गाय को ‘अघ्न्या’ — अर्थात् जिसे मारना पाप है — कहा गया है, और पृथ्वी को माता के रूप में पूज्य माना गया है।
“माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः।” — अथर्ववेद १२.१.१२
(पृथ्वी मेरी माता है और मैं उसका पुत्र हूँ।)
यह वैदिक दृष्टि स्वयं में गोवर्धन पूजा का दार्शनिक आधार है।
प्रकृति ही पालनकर्ता माता है, और उसका संरक्षण ही सच्ची पूजा है। भागवत पुराण और विष्णु पुराण के अनुसार, जब ब्रजवासी इन्द्र की पूजा किया करते थे, तब बालकृष्ण ने उन्हें प्रकृति स्वरूप गोवर्धन पर्वत की पूजा का उपदेश दिया। उन्होंने कहा — “हमारा जीवन पालन इन्द्र की वर्षा से नहीं, बल्कि गोवर्धन पर्वत, गौओं और प्रकृति से होता है।” इस प्रकार उन्होंने समाज को देवपूजा से प्रकृतिपूजा की दिशा में प्रवृत्त किया। जब इन्द्र क्रोधित होकर मूसलाधार वर्षा करने लगे, तब श्रीकृष्ण ने अपनी कनिष्ठा अंगुली पर गोवर्धन पर्वत उठाकर ब्रजवासियों की रक्षा की। यह घटना प्रतीक है — “जब मनुष्य प्रकृति की रक्षा करता है, तब प्रकृति स्वयं उसकी रक्षा करती है।”
गोवर्धन पूजा वस्तुतः पर्यावरण संरक्षण का प्राचीन उत्सव है। इस दिन गोवर्धन पर्वत, गौ, वृक्ष, जल, अन्न और भूमि — सभी की सामूहिक पूजा की जाती है।
इन प्रतीकों का अर्थ गहन और वैज्ञानिक है —
गोवर्धन पर्वत – जलस्रोत, वनों और पारिस्थितिक संतुलन का प्रतीक।
गौ (गाय) – कृषि, दुग्ध, जैविक खाद और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की आधारशिला।
अन्नकूट – समृद्धि, साझा भोजन और सामाजिक समरसता का प्रतीक, जो सतत विकास का संदेश देता है।
गोवर्धन परिक्रमा – पर्वत, वृक्ष, जलाशय और भूमि के प्रति कृतज्ञता की आध्यात्मिक अभिव्यक्ति।
यह पर्व भारतीय कृषि और पशुपालन संस्कृति का ज्वलंत प्रतीक है। ग्रामीण समाज में यह सामूहिकता, श्रम और सह-अस्तित्व का उत्सव है। इस दिन गोबर से बनाए गए गोवर्धन पर्वत जैविक उर्वरता और पर्यावरणीय पुनर्चक्रण (eco-recycling) का प्रतीक हैं।
गोवर्धन पूजा हमें यह सिखाती है कि — “ईश्वर केवल आकाश में नहीं, प्रत्येक हृदय आकाश तथा वृक्ष, पर्वत, जीव और कण में विद्यमान है।” यह अद्वैत दर्शन का व्यावहारिक रूप है, जहाँ मानव और प्रकृति में कोई भेद नहीं, केवल एकत्व है।
गोवर्धन पूजा का मूल भाव है — “प्रकृति की पूजा ही परमात्मा की पूजा है।” यह पर्व हमें स्मरण कराता है कि भौतिक प्रगति के साथ यदि हम प्रकृति का संतुलन नहीं बनाए रखते, तो जीवन का आधार ही डगमगा जाएगा। अतः गोवर्धन पूजा केवल धार्मिक कर्मकाण्ड नहीं, बल्कि वैदिक पर्यावरण दर्शन की सजीव अभिव्यक्ति है — जहाँ कृष्ण प्रकृति के रक्षक हैं और गोवर्धन पर्वत जीवन का आधार।