आत्मा की शाश्वतता का ज्ञान ही गीता का मुख्य ध्येय है

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लेखक: अवधेश झा

भारतीय चिंतन परम्परा में श्रीमद्भगवद्गीता एक प्रसाद-ग्रन्थ है और जीवन के गहरे प्रश्नों का शाश्वत उत्तर है। यह मनुष्य के भीतर सोई हुई दिव्यता को जगाती है और उसे बताती है कि उसका वास्तविक स्वरूप शरीर-इंद्रियों का नहीं, बल्कि शुद्ध, नित्य, सर्वव्यापी आत्मा का है।

इसी सत्य को रेखांकित करते हुए जस्टिस राजेन्द्र प्रसाद कहते हैं—

“गीता आत्मा की शाश्वतता का ही ज्ञान है; यह अपने ब्रह्म-स्मृति में लौटने का उत्तम साधन है। इसके ज्ञान से अर्जुन को अपनी स्वरूप-स्थिति का बोध हुआ था।”

वास्तव में गीता का सारा संदेश एक ही सूत्र में पिरोया जा सकता है—
ब्रह्म-अर्पणम् — अर्थात् कर्म, मन, बुद्धि और अहंकार का अपने मूल आत्म स्वरूप परम ब्रह्म में समर्पण। गीता—अज्ञान से ज्ञान की ओर यात्रा है।
अर्जुन का विषाद मानव जीवन की उन सभी स्थितियों का प्रतिनिधि है, जब मनुष्य परिस्थितियों से घिरकर अपने धर्म, अपने कर्तव्य और अपने आत्मस्वरूप को भूल जाता है। गीता इस विस्मृति का निवारण करती है।
कृष्ण अर्जुन से कहते हैं—
“न त्वेवाहं जातु नासं…” (गीता 2.12)
हम सब किसी समय में नहीं थे; ऐसा नहीं है, और आगे भी कभी न रहने वाले नहीं हैं। यह आत्मा की अनादि–नित्य सत्ता का उद्घोष है। कृष्ण बार-बार समझाते हैं कि जो जन्मता है वह शरीर है, पर जो धारण करता है, वह आत्मा है और वह नित्य है। इसी आत्मा की पहचान ही गीता का प्रथम अध्याय से अठारहवें अध्याय तक अंतर्निहित संदेश है।

आत्मा की शाश्वतता—कर्मयोग की आधारशिला है। जब मनुष्य यह जान लेता है कि वह नश्वर शरीर नहीं, बल्कि शुद्ध आत्मा है, तभी उसके जीवन में कर्मयोग का वास्तविक उदय होता है। अर्जुन को समझाते हुए भगवान कहते हैं—
“कर्मण्येवाधिकारस्ते…” (गीता 2.47)
कर्म करना तुम्हारा धर्म है, पर फल की अपेक्षा तुम्हें बाँधती है। क्योंकि फल-त्याग कोई निराशा नहीं, बल्कि स्वरूप-स्मृति का परिणाम है। जो जानता है कि आत्मा नित्य है— उसके लिए न लाभ उत्साह का कारण होता है और न हानि विषाद का, और यही कर्मयोग का केंद्रबिंदु भी है।
गीता—इंद्रिय से अहंकार तक अर्पण है। वास्तव में गीता ब्रह्म-अर्पण ही है। इंद्रिय के विषय का अर्पण, फिर बुद्धि, मन, अहंकार का आत्मस्वरूप में अर्पण करना है। कृष्ण कहते हैं—
“ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविः…” (गीता 4.24)
जिसकी चेतना शुद्ध हो जाती है, उसके लिए हर कर्म एक यज्ञ हो जाता है।
यह यज्ञ बाहरी अग्नि में आहुति देने का नहीं, बल्कि अहंकार को आत्मा में विलीन करने का है। सभी इंद्रियाँ और उनके विषय, अहंकार, मन और बुद्धि ब्रह्म में अर्पित करना ही अंतःकरण-शुद्धि है और यही योग का सार है। यही स्वरूप-स्थिति प्राप्ति की यात्रा है। गीता में कहा गया है—
“बुद्धौ शरणमन्विच्छ…” (गीता 2.49)
अर्थात् बुद्धि को आत्मा के प्रकाश में स्थिर करो।

निष्काम कर्म—स्थिर बुद्धि की अवस्था ही ध्येय है। अर्जुन का वास्तविक रूपांतरण तब होता है जब वह ‘कर्तृत्व’ के दंभ से मुक्त होकर यह समझ लेता है कि— कर्ता परमात्मा है, मैं केवल निमित्त हूँ, और फल भी उसी की शक्ति से आता है। इसी को कृष्ण कहते हैं—
“निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन्।” (गीता 11.33)
यह भाव जब हृदय में उतर जाता है, तब मनुष्य जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में निर्भय, निस्पृह और निष्काम होकर कर्म कर सकता है। यही कर्मयोग है — स्वधर्म में स्थित होकर समभाव से कर्म करना।
गीता—आधुनिक मनुष्य के लिए मार्गदर्शक है। आज भी मनुष्य कभी-कभी अर्जुन जैसी स्थिति में पहुँच जाता है— कभी तनावग्रस्त, कभी निर्णयहीन, कभी मोह और भय से ग्रसित। इसीलिए गीता का संदेश आज सभी कालों से अधिक प्रासंगिक है। जीवन में उद्देश्य चाहिए, निर्णय में स्पष्टता चाहिए, मन की स्थिरता चाहिए और भय तथा मोह से मुक्ति चाहिए— गीता यह सब प्रदान करती है।

वह हमें आत्मा के अमर, अजेय, निर्विकारी स्वरूप का स्मरण कराती है, और फिर कहती है— उठो और अपने धर्म का पालन करो। गीता का चरम संदेश—समर्पण और एकत्व अठारहवें अध्याय तक पहुँचते-पहुँचते कृष्ण अर्जुन से कहते हैं— “सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।” (18.66)
यह समर्पण— अज्ञान के त्याग का समर्पण है, व्यर्थ अहंकार के त्याग का समर्पण है और अपने शुद्ध आत्मस्वरूप में स्थित होने का आह्वान है।
समर्पण के बाद ही अर्जुन घोषणा करता है—
“नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा।” (18.73)
मेरा मोह नष्ट हो गया और मेरी स्मृति लौट आई।
यही स्मृति—ब्रह्म-स्मृति—ही गीता का ज्ञान है।

गीता जयंती स्मरण दिलाती है कि यह दिव्य संवाद केवल कुरुक्षेत्र का प्रसंग नहीं है, बल्कि यह मानव जीवन के प्रत्येक संकट और मोड़ पर प्रकाश देने वाला शाश्वत दीप है। गीता हमें बताती है— आत्मा नित्य है, कर्म अनिवार्य है, और समर्पण ही मुक्ति है। अतः गीता का मुख्य ध्येय यही है कि मनुष्य अपने शाश्वत आत्मस्वरूप को जाने और उसी ज्ञान के आधार पर कर्मयोग का आरंभ करे। इसी में जीवन का श्रेष्ठ मार्ग है और यही गीता का अमर संदेश है।

(गीता जयंती पर विशेष)

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