गीत संगीत हिंदी सिनेमा का लाइफ लाइन है: रीना सोपम, वरिष्ठ पत्रकार तथा कला लेखिका

Art and culture
  • कंचन चौधरी

पटना: पुस्तक मेला के फिल्म फेस्टिवल के दूसरे दिन दर्शकों से खचाखच भरे हॉल में दो खास फिल्मों का प्रदर्शन हुआ। पहली फिल्म थी पद्मश्री प्रोफेसर सी एल दास पर बनी डॉक्यूमेंट्री ‘एक अनुभव, प्रो सी एल दास’, जो इस विशिष्ट सांस्कृतिक विचारक और सारंगी वादक की जीवन यात्रा को समर्पित है। दूसरी फिल्म थी राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त अभिनेता पंकज त्रिपाठी अभिनीत चर्चित फिल्म ‘लाली’। दोनों फिल्मों को दर्शकों ने खूब सराहा।स्क्रीनिंग से पहले ‘सिनेमा और संगीत’ विषय पर वरिष्ठ पत्रकार एवं कला लेखिका रीना सोपम और फिल्म फेस्टिवल के आयोजक रविकांत सिंह के बीच विचारोत्तेजक चर्चा हुई।

रीना सोपम ने कहा, “गीत-संगीत भारतीय सिनेमा की लाइफलाइन है। जब मूक फिल्मों का दौर था और डायलॉग नहीं होते थे, तब भी फिल्मों में गीत-संगीत का भरपूर इस्तेमाल होता था। दादासाहेब फाल्के की पहली फिल्म ‘राजा हरिश्चंद्र’ (1913) मूक फिल्म थी, लेकिन उसमें लाइव संगीत का प्रयोग किया गया था।” उन्होंने हिंदी सिनेमा में गीत-संगीत की लगभग सवा सौ साल की यात्रा पर विस्तार से प्रकाश डाला।इस मौके पर सिनेमा विशेषज्ञ श्री आर एन दास ने कहा कि सिनेमा और संगीत के इस महत्वपूर्ण पहलू पर बहुत कम किताबें उपलब्ध हैं।

उन्होंने रीना सोपम से इस विषय पर एक पुस्तक लिखने का आग्रह किया और घोषणा की कि इस किताब का प्रकाशन सिने सोसाइटी करेगी।कार्यक्रम के प्रारंभ में पुस्तक मेला के आयोजक अमित झा ने गोल इंस्टीट्यूट के निदेशक विपिन कुमार सिंह, लोक गायिका ऋचा, रीना सोपम और डॉ. … को सम्मानित किया।पूरे कार्यक्रम का संचालन रंगकर्मी एवं फिल्म फेस्टिवल आयोजक रविकांत सिंह ने कुशलतापूर्वक किया।

बिहार पटना पुस्तक मेला : फिल्म फेस्टिवल में ‘एक अनुभव, प्रो सी एल दास’ और पंकज त्रिपाठी की ‘लाली’ की स्क्रीनिंग, सिनेमा-संगीत पर गहन चर्चा । दर्शक दीर्घा में शहर के कई गणमान्य नागरिक, साहित्यकार, कलाकार और सिनेमा प्रेमी उपस्थित थे।पटना पुस्तक मेला में चल रहा यह फिल्म फेस्टिवल सिनेमा और साहित्य के बीच सेतु बनाने का सराहनीय प्रयास बन रहा है।बिहार, पटना पुस्तक मेला!!

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