पटना के सामाजिक, शैक्षणिक और नगर विकास के इतिहास में कई ऐसे व्यक्तित्व रहे हैं, जिन्होंने अपने कार्यों से शहर की पहचान को नई दिशा दी। इन्हीं में एक महत्वपूर्ण नाम “के.एन. सहाय यानि कृष्णनंदन सहाय” का है। नगर प्रशासन, राजनीति, शिक्षा और समाजसेवा के क्षेत्र में उनके योगदान को देखते हुए अब उनके सम्मान में स्थायी स्मृति-चिह्न स्थापित करने की मांग उठी है।
पटना उच्च न्यायालय के वरीय अधिवक्ता, घटना चक्र टाइम्स पत्रिका के संपादक तथा ग्लोबल कायस्थ कांफ्रेंस (जीकेसी) के ग्लोबल उपाध्यक्ष-सह-बिहार प्रदेश अध्यक्ष दीपक कुमार अभिषेक ने बिहार सरकार से मांग की है कि पटना के तारामंडल के निकट स्थित ‘सहाय भवन’ को के.एन. सहाय स्मारक भवन घोषित किया जाए। साथ ही भवन परिसर में के.एन. सहाय की आदमकद प्रतिमा स्थापित की जाए, ताकि आने वाली पीढ़ियां उनके योगदान से परिचित हो सके।
के.एन. सहाय को पटना नगर निगम के लोकप्रिय और लंबे समय तक सेवा देने वाले नेताओं में गिना जाता है। उपलब्ध विवरणों के अनुसार वे कई बार पटना के मेयर रहे और नगर प्रशासन से जुड़े रहे। उनकी पहचान केवल एक राजनेता के रूप में नहीं, बल्कि पटना के विकास और नागरिक जीवन से जुड़े व्यक्तित्व के रूप में भी रही। उन्होंने नगर निकाय के माध्यम से शहर की समस्याओं को समझने और उनके समाधान की दिशा में काम किया। यही कारण है कि पटना के नगर इतिहास में उनका नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय माना जाता है।
के.एन. सहाय का सार्वजनिक जीवन नगर निगम तक सीमित नहीं था। वे बिहार की राजनीति में भी सक्रिय रहे। वे विधायक तथा विधान पार्षद के रूप में भी अपनी भूमिका निभा चुके थे। बिहार के चर्चित जमींदारी परिवार ‘बाघी एस्टेट’ से जुड़े होने के बावजूद उन्होंने सार्वजनिक जीवन में अपनी अलग पहचान बनाई। उनकी राजनीतिक और सामाजिक सक्रियता का दायरा व्यापक था। यही वजह है कि उनके व्यक्तित्व को केवल किसी एक संस्था अथवा पद से जोड़कर देखना उनके योगदान को सीमित करना होगा।
के.एन. सहाय के जीवन का एक महत्वपूर्ण पक्ष उनका शैक्षणिक योगदान भी था। मुजफ्फरपुर में श्याम नंदन सहाय कॉलेज तथा तिरहुत शारीरिक शिक्षण महाविद्यालय की स्थापना से उनका नाम शिक्षा के क्षेत्र में भी जुड़ा। उनका मानना था कि समाज की वास्तविक प्रगति शिक्षा के विस्तार से ही संभव है। शिक्षा संस्थानों की स्थापना के माध्यम से उन्होंने नई पीढ़ी को बेहतर अवसर उपलब्ध कराने की दिशा में योगदान दिया।
के.एन. सहाय के नाम से K.N. Sahay Institute of Environmental & Urban Development का संचालन भी उनकी विरासत को पर्यावरण और शहरी विकास के विमर्श से जोड़ता है। किसी शहर का विकास केवल सड़कों और भवनों के निर्माण से नहीं होता, बल्कि पर्यावरण, नागरिक सुविधाओं और सुनियोजित शहरीकरण का भी उसमें महत्वपूर्ण स्थान होता है। इसी दृष्टि से उनके नाम पर संस्थान का संचालन उनकी सोच और सार्वजनिक जीवन की व्यापकता को सामने लाता है।
दीपक अभिषेक की मांग केवल प्रतिमा लगाने तक सीमित नहीं है। उनका कहना है कि तारामंडल के समीप स्थित ‘सहाय भवन’ को के.एन. सहाय स्मारक भवन घोषित किया जाना चाहिए। इससे उनके जीवन और योगदान से संबंधित सामग्री, दस्तावेज, तस्वीरें और नगर विकास से जुड़ा इतिहास सुरक्षित रखने के लिए एक स्थायी केंद्र विकसित किया जा सकता है। यदि यहां उनकी आदमकद प्रतिमा भी स्थापित होती है, तो यह स्थान पटना के इतिहास और नगर विकास की विरासत को याद करने वाला महत्वपूर्ण स्थल बन सकता है।
किसी शहर की पहचान केवल उसकी इमारतों और सड़कों से नहीं होती। उस शहर को बनाने वाले लोगों की स्मृति भी उसकी विरासत का हिस्सा होती है। पटना के विकास में योगदान देने वाले व्यक्तित्वों को सम्मानित करना नई पीढ़ी को अपने शहर के इतिहास से जोड़ने का माध्यम बन सकता है। के.एन. सहाय के संदर्भ में उठी यह मांग इसी दृष्टि से महत्वपूर्ण है। ‘सहाय भवन’ को स्मारक भवन का दर्जा और वहां आदमकद प्रतिमा की स्थापना उनके सार्वजनिक जीवन, शिक्षा और समाजसेवा की विरासत को स्थायी रूप से संरक्षित करने की दिशा में एक कदम हो सकता है। अब देखना यह है कि बिहार सरकार इस मांग पर क्या निर्णय लेती है और पटना अपने इस महत्वपूर्ण नगरसेवी की स्मृति को किस रूप में संरक्षित करता है।