भाजपा सरकार पर सनातन परंपराओं के अपमान का आरोप, प्रयागराज माघ मेला में शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद के स्नान को लेकर विवाद गहराया

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  • कंचन चौधरी

प्रयागराज | 21 जनवरी 2026 :: प्रयागराज माघ मेला 2026 के दौरान मौनी अमावस्या (18 जनवरी) को ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती की पालकी को संगम नोज तक जाने से रोके जाने का मामला अब गंभीर राजनीतिक, धार्मिक और सामाजिक विवाद का रूप ले चुका है। घटना के विरोध में शंकराचार्य जी त्रिवेणी मार्ग, सेक्टर-4 स्थित अपने शिविर के बाहर लगातार तीसरे दिन बिना अन्न-जल के अनशन पर बैठे हैं।

“सनातन परंपरा का अपमान” — शंकराचार्य का आरोप

शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने आरोप लगाया कि मेला प्रशासन और पुलिस ने जानबूझकर सदियों पुरानी सनातन परंपरा को तोड़ा। उन्होंने कहा कि शंकराचार्य परंपरागत रूप से पालकी में संगम स्नान करते आए हैं और यह किसी प्रशासनिक अनुमति का विषय नहीं, बल्कि “मां गंगा से मिलने का अधिकार” है।

उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि उनके शिष्यों और समर्थकों के साथ पुलिस ने बदसलूकी की। एक बटुक ब्राह्मण की चोटी पकड़कर घसीटने का कथित वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद आक्रोश और बढ़ गया है।
शंकराचार्य जी ने स्पष्ट कहा कि जब तक मेला प्रशासन और पुलिस सार्वजनिक रूप से माफी नहीं मांगते और उन्हें सम्मानपूर्वक स्नान नहीं कराया जाता, तब तक वे गंगा स्नान नहीं करेंगे। उन्होंने यह भी घोषणा की कि आगे प्रत्येक मेला में वे आएंगे, लेकिन शिविर में नहीं, बल्कि फुटपाथ पर व्यवस्था करके रहेंगे।

प्रशासन का पक्ष: “भीड़ प्रबंधन था कारण”

मेला कमिश्नर, पुलिस कमिश्नर जोगिंदर कुमार और एसपी (माघ मेला) नीरज पांडेय ने संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस में प्रशासन का पक्ष रखा। अधिकारियों के अनुसार मौनी अमावस्या के दिन 4.52 करोड़ से अधिक श्रद्धालुओं की मौजूदगी के कारण सुरक्षा कारणों से पालकी को आगे नहीं जाने दिया गया।
प्रशासन का कहना है कि शंकराचार्य जी को पैदल स्नान का सुझाव दिया गया था, लेकिन उनके शिष्यों द्वारा बैरिकेड तोड़ने की कोशिश के बाद स्थिति तनावपूर्ण हो गई। सीसीटीवी फुटेज में बैरिकेड तोड़ने के दृश्य होने का दावा भी किया गया। अधिकारियों ने कहा कि स्नान से रोका नहीं गया, बल्कि भीड़ नियंत्रण प्राथमिकता थी।

नया मोड़: ‘शंकराचार्य’ उपाधि पर नोटिस

विवाद को और हवा तब मिली जब माघ मेला प्राधिकरण ने स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को नोटिस जारी कर पूछा कि सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन मामले के बावजूद वे ‘शंकराचार्य’ उपाधि का उपयोग क्यों कर रहे हैं। शिविर के बोर्ड पर इस उपाधि के प्रयोग पर आपत्ति जताते हुए 24 घंटे के भीतर जवाब मांगा गया है।

राजनीतिक घमासान तेज

इस मुद्दे पर विपक्ष ने भाजपा और योगी सरकार पर तीखा हमला बोला है। कांग्रेस नेता पवन खेड़ा ने कहा, “भाजपा ना काम के हैं, ना राम के हैं। सत्ता और धन के लिए संतों का अपमान किया जा रहा है। प्रधानमंत्री मोदी को हस्तक्षेप करना चाहिए, वरना भाजपा ‘सनातनी’ नहीं, ‘धनतनी’ साबित होगी।”
समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव ने शंकराचार्य से फोन पर बात कर समर्थन जताया और निष्पक्ष जांच की मांग की। सपा ने इसे सनातन परंपरा का सीधा अपमान बताया। भाजपा या योगी सरकार की ओर से अब तक कोई स्पष्ट माफी या बड़ा बयान सामने नहीं आया है, हालांकि कुछ अखाड़ा संतों ने संयम और संवाद की अपील की है।

सोशल मीडिया पर तीखी बहस

सोशल मीडिया पर यह मुद्दा लगातार ट्रेंड कर रहा है। कुछ लोग इसे प्रशासनिक मजबूरी और भीड़ प्रबंधन बता रहे हैं, तो कई इसे संतों और सनातन परंपरा के सम्मान से जोड़कर देख रहे हैं। प्रयागराज माघ मेला का यह विवाद अब सत्ता, प्रशासन और सनातन परंपराओं के टकराव का प्रतीक बनता जा रहा है।

शंकराचार्य के समर्थन में अन्य शंकराचार्य भी आए

इस बीच शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर अपनी बात रखी, उन्होंने कहा शंकराचार्य का निर्धारण सरकार नहीं, अन्य शंकराचार्य ही करते हैं और मुझे अन्य शंकराचार्यों से मौन या निर्विरोध सहमति प्राप्त है। अन्य शंकराचार्य भी इस कृत्य के लिए सरकार को दोषी ठहराया है।

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