- इषिका शर्मा
कभी कभी मैं सोचती हूँ,
आखिर वो कौन स्त्री होती हैं,
जो श्रृंगार छोड़ देती हैं?
शायद वो खून से लथपथ बॉर्डर पर पाई जाती हैं,
या किसी जंग – ए – मैदान में
अपने देश के लिए लड़ती है।
या अपने ही घर परिवार में
अपने ही हक के लिए लड़ती हैं।
या किसी घर में बेचारी, बेजान बनकर
घूंघट में बैठी रहती है।
आखिर कोई तो स्त्री होती है,
जो अपना श्रृंगार छोड़ देती हैं?
शायद वो वैसी स्त्री होती हैं,
जो अपने घर को छोड़, ससुराल संभालने चलती हैं
शायद वो अपने पति और बच्चों को देखने में,
खुद को थोड़ा – थोड़ा खोती हैं,
या रोज सुबह उठकर, पूरा घर संभल कर
हर दिन काम पर जाती हैं।
और इस तरह, वह खुद को ढक कर
दूसरों के लिए सजती हैं।
शायद, वो वैसी ही स्त्री होती हैं
जो श्रृंगार छोड़ देती हैं।
और जब वही स्त्री,
जिम्मेदारियों के बोझ तले दबकर
खुद की ख़्वाइशें छुपाती हैं,
तब वो स्त्री खुद को मज़बूत, कठोर बनाकर
अंदर से बिखरती हैं,
शायद वो खुद के साहस के झंडे गाड़ कर
अंदर से टुकड़ों में चूर होती हैं।
शायद… वो बचपन से, औरत से ज़्यादा,
मर्द को परिभाषित करती हैं।
और शायद… वो वैसी ही स्त्री होती हैं,
जो अपना श्रृंगार छोड़ देती हैं।