देखना होगा संविधान और कानून की मर्यादा का ख्याल किस प्रकार रखते है, दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल

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  • जितेन्द्र कुमार सिन्हा

पटना, 28 मार्च, 2024 :: देश में विपक्षी पार्टियाँ, सरकार के बदलाव की, बयार का सपना देखने वाले अब चिंतित और चिंतनशील दिखने लगे हैं। देश में लोकसभा चुनाव का शंखनाद हो चुका है, नामांकन प्रक्रिया शुरू हो चुका है और सभी पार्टियाँ चुनाव प्रचार के लिए भी प्रस्थान कर चुका है। एक लंबे अंतराल के साथ चुनाव सात चरणों में पूरा होगा। अधिकांश विपक्षी पार्टियाँ भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ी हुई प्रतीत होती है। कुछ दिग्गज नेता या तो जेल जा चुके है, या जमानत पर हैं या जेल जाने की तैयारी में है। वर्तमान समय में देखा जाय तो अधिकांश राजनीतिक पार्टियों को राजनीतिक पार्टियाँ मानना और कहना भी गुनाह लगता है, क्योंकि उन्हें तो ‘पारिवारिक’ पार्टियाँ कहना ही ज्यादा उचित लगता है।

संविधान निर्माताओं ने शायद कल्पना भी नहीं की होगी की देश में ऐसी स्थिति आयेगी जहां मुख्यमंत्री केपद पर रहते हुए उन्हें गिरफ्तार करने की भी नौबत आयेगी। आज देश के समक्ष पहली बार मुख्यमंत्री की गिरफ्तारी हुई है और यह मुख्यमंत्री जेल से सरकार चलाएंगे। जहां तक मैं समझता हूँ कि आजादी के बाद यह पहली बार ही हुआ है कि जब किसी मुख्यमंत्री को गिरफ्तार किया गया है। जबकि यह देखा गया है कि जब मुख्यमंत्री पर आरोप लगते थे तो गिरफ्तारी से ठीक पहले मुख्यमंत्री पद से इस्तीफे दे देते हैं। ऐसे में उदाहरण के रूप में बिहार के लालू प्रसाद और झारखंड के हेमंत सोरेन का नाम है।

चारा घोटाले के मामले में 30 जुलाई,1997 को लालू यादव ने अदालत के सामने आत्मसमर्पण किया था, इससे पहले 25 जुलाई, 1997 को उन्होंने बिहार के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दिया था। मामले में रक्षा भूमि घोटाला मामले में ईडी ने 31 जनवरी 2024 को झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को उनके आवास पर जाकर पूछताछ की थी और हिरासत में लिया था। हेमंत सोरेन ने राजभवन जाकर अपनी इस्तीफा दिया था और चम्पई सोरेन के नेतृत्व में नयी सरकार बनाने का पत्र सौंपा था। आय से अधिक की संपत्ति अर्जित करने के मामले में तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता की भी गिरफ्तारी हुई थी। 7 दिसंबर, 1996 को जयललिता की गिरफ्तार हुई, जबकि 5 दिसंबर, 1996 तक ही जयललिता तमिलनाडु की मुख्यमंत्री रही थी। जमीन मामले में कर्नाटक के मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा ने 15 अक्तूबर, 2011 को लोकायुक्त अदालत में आत्मसमर्पण किया था। इससे पहले 31 जुलाई, 2011 को उन्होंने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था।

अब देखा जाय तो दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल का गिरफ्तारी की नौबत आने पर वे गिरफ्तारी से बचने के लिए कानूनी लड़ाई लड़नी चाही लेकिन हाईकोर्ट से राहत नहीं मिली। ऐसी स्थिति में अब प्रश्न उठता है कि मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल का जेल से सरकार चलाना, क्या संभव है? या सही होगा? जब कोई सरकारी सेवक जेल जाता है तो उसे 48 घंटे बाद निलंबित हो जाता है। तो ऐसी स्थिति में मुख्यमंत्री को अपने पद पर कैसै बने रह सकता हैं? जबकि सर्वविदित है कि किसी भी राज्य की सरकार को सुचारू रूप से चलाने के लिए गिरफ्तारी की नौबत या जेल जाने के पहले मुख्यमंत्री को इस्तीफा देना पड़ता है।

जहां तक जेल नियमों के समय में बताया जाता है कि किसी कैदी को सप्ताह में दो दिन ही परिजन से मिलने की छूट मिल सकती है और यह भी जेल अधीक्षक की अनुमति पर ही संभव होता है। जेल से कोई पत्र भी जेल अधीक्षक की अनुमति और माध्यम के बिना बाहर किसी को नहीं भेजा जा सकता है। वर्तमान स्थिति में दिल्ली के उप राज्यपाल के रुख पर ही अरविंद केजरीवाल का मुख्यमंत्री के पद पर बना रहना मुमकिन प्रतीत नहीं होता है।

संविधान के जानकार का माने तो कानून की नजर में गिरफ्तारी होना दोष सिद्धि नहीं माना जाता है। ऐसे में किसी मुख्यमंत्री की गिरफ्तारी के तुरंत बाद उनसे इस्तीफा नहीं लिया जा सकता है। जेल से सरकार चलाने के सवाल पर कानून के जानकार कहते हैं, जेल से सरकार चलाना जेल के नियमों पर काफी निर्भर करेगा। मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल पर यह निर्भर कर रहा है कि वे संविधान और कानून की मर्यादा का ख्याल किस प्रकार रखते है।

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