लेखक: अवधेश झा
भारतीय सनातन संस्कृति का मूल तत्व है — एकत्व की अनुभूति, जहाँ समस्त जगत में ईश्वर का दर्शन किया जाता है।
गोस्वामी तुलसीदास जी की अमर पंक्ति —
“सिया राम मय सब जग जानी, करउँ प्रणाम जोरि जुग पानी।”
— इसी अद्वैत भाव को व्यक्त करती है। यहाँ ‘सिया’ (सीता) और ‘राम’ प्रकृति और पुरुष, शक्ति और चैतन्य, माया और ब्रह्म के शाश्वत समन्वय के प्रतीक हैं।
उपनिषदों में भी यही सत्य उद्घोषित है—
“सर्वं खल्विदं ब्रह्म” (छांदोग्य उपनिषद् ३.१४.१)
अर्थात् यह सम्पूर्ण जगत ब्रह्म ही है।
और—
“ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्” (ईशोपनिषद् १)
— इस समस्त जगत में ईश्वर का ही वास है।
इसी दिव्य भावभूमि पर राम नवमी का पावन पर्व हमें मातृ शक्ति की महिमा और मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के अवतरण का स्मरण कराता है।
राम नवमी: दिव्य अवतरण का महोत्सव
वाल्मीकि रामायण के अनुसार, चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को भगवान श्रीराम का अवतरण हुआ—
“ततो यज्ञे समाप्ते तु ऋतूनां षट्समत्ययुः।
ततः च द्वादशे मासे चैत्रे नवमिके तिथौ॥”
(वाल्मीकि रामायण, बालकाण्ड १८.८)
अर्थात् यज्ञ की पूर्णता के पश्चात् बारहवें महीने के चैत्र शुक्ल नवमी को भगवान श्रीराम का अवतरण हुआ।
श्रीमद्भागवत महापुराण (९.१०) में श्रीराम को विष्णु के अवतार के रूप में वर्णित किया गया है—
“रामो विग्रहवान् धर्मः”
अर्थात् श्रीराम स्वयं धर्म के साकार स्वरूप हैं।
उपनिषदों की दृष्टि से यह अवतरण निर्गुण ब्रह्म का सगुण रूप में प्रकट होना है—
“परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।
धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे॥”
अर्थात् सनातन धर्म और वैदिक संस्कृति की पुनः स्थापना के लिए भगवान अवतार लेते हैं। यह उसी ब्रह्मतत्त्व की अभिव्यक्ति है, जो लोककल्याण हेतु अवतरित होता है।
मातृ शक्ति — सिद्धिदात्री का स्वरूप
भारतीय दर्शन में कहा गया है— शक्ति के बिना शिव भी शून्य हैं।
सीता जी श्रीराम की अर्धांगिनी के साथ आदिशक्ति का साक्षात् स्वरूप हैं।
देवी परंपरा में वर्णित है—
“या देवी सर्वभूतेषु शक्ति-रूपेण संस्थिता।”
उपनिषदों में भी शक्ति और ब्रह्म के संबंध को सूक्ष्म रूप में व्यक्त किया गया है—
“मायां तु प्रकृतिं विद्यान्मायिनं तु महेश्वरम्” (श्वेताश्वतर उपनिषद् ४.१०)
— माया (प्रकृति) को शक्ति और महेश्वर को उसके अधिष्ठाता के रूप में जानना चाहिए।
सीता जी का प्राकट्य स्वयं भूमि देवी से हुआ—
वे भू-शक्ति, करुणा, त्याग और सहिष्णुता की मूर्ति हैं।
उनके बिना राम कथा अपूर्ण है।
सिया-राम: अद्वैत का साकार रूप
‘सिया-राम’ का तात्पर्य है—
सीता = प्रकृति (शक्ति)
राम = पुरुष (चैतन्य)
उपनिषदों का महावाक्य—
“तत्त्वमसि” (छांदोग्य उपनिषद् ६.८.७)
— यह दर्शाता है कि जीव और ब्रह्म में भेद नहीं है।
इसी प्रकार ‘सिया-राम’ का भाव बताता है कि शक्ति और चैतन्य का अभेद ही सृष्टि का मूल सत्य है।
तुलसीदास जी ने उसी सत्य को सरल शब्दों में व्यक्त किया—
“सिया राम मय सब जग जानी, करउँ प्रणाम जोरि जुग पानी।”
राम नवमी और मातृ शक्ति का संबंध
श्रीराम का अवतरण धर्म, मर्यादा और संतुलन का अवतरण है और यह संभव होता है मातृ शक्ति के सहयोग से—
कौशल्या — मातृत्व की करुणा
कैकेयी — नियति का साधन
सुमित्रा — त्याग और संतुलन
सीता — शक्ति और धर्म की आधारशिला
शास्त्रों में कहा गया है—
“यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः।” (मनुस्मृति)
— जहाँ नारी का सम्मान होता है, वहाँ देवता निवास करते हैं।
एकत्व का दर्शन यह है कि हर प्राणी में ईश्वर का अंश है—
“अहं ब्रह्मास्मि” (बृहदारण्यक उपनिषद्)
— इस भाव से विभेद समाप्त होता है।
शक्ति और संतुलन
जीवन में ज्ञान, शक्ति और करुणा भी आवश्यक हैं।
मर्यादा का पालन श्रीराम के आदर्श जीवन का उत्तम उदाहरण है।
धर्म कठिन हो सकता है, पर त्याज्य नहीं।
“सिया राम मय सब जग जानी” यह उपनिषदों का जीवंत दर्शन है।
श्रीराम नवमी हमें यह स्मरण कराती है कि जब-जब धर्म की हानि होती है, तब-तब ब्रह्म और शक्ति का दिव्य संगम इस धरती पर अवतरित होता है।
अतः इस पावन अवसर पर अपने भीतर सिया-राम के एकत्व भाव को जागृत करें— “ईशावास्यमिदं सर्वं” — इस भाव को जीते हुए,
“सिया राम मय सब जग जानी” को अपने जीवन का आधार बनाएं।
जय मातृशक्ति सिद्धिदात्री, जय सियाराम