- कंचन चौधरी
पटना, 16 मई 2026 :: बिहार सहित संपूर्ण मिथिला क्षेत्र में शनिवार को विवाहित महिलाओं ने श्रद्धा, आस्था और पारंपरिक उल्लास के साथ वट सावित्री व्रत का पालन किया। राजधानी पटना से लेकर दरभंगा, मधुबनी, समस्तीपुर, सीतामढ़ी, सुपौल, पूर्णिया और ग्रामीण अंचलों तक बरगद के वृक्षों के समीप महिलाओं की भीड़ उमड़ पड़ी। महिलाओं ने अखंड सौभाग्य, पति की दीर्घायु, परिवार की सुख-समृद्धि तथा वैवाहिक जीवन की मंगलकामना के लिए पूजा-अर्चना की।
यह पवित्र पर्व महाभारत में वर्णित सावित्री और सत्यवान की अमर कथा पर आधारित है और भारतीय संस्कृति में पतिव्रता धर्म, स्त्री शक्ति तथा पारिवारिक मूल्यों का प्रतीक माना जाता है।
मिथिला की लोक संस्कृति में वट सावित्री का विशेष महत्व
मिथिला क्षेत्र में वट सावित्री व्रत लोक संस्कृति, पारिवारिक परंपरा और नारी आस्था का जीवंत उत्सव है। गांवों और शहरों में महिलाएँ पारंपरिक मैथिली परिधान, लाल-पीली साड़ियों, मांग में सिंदूर और हाथों में पूजा की डलिया लेकर वट वृक्ष के नीचे एकत्रित हुईं।
बिहार में इस अवसर पर लोकगीतों और पारंपरिक कथाओं का भी विशेष महत्व है। कई स्थानों पर महिलाओं ने सामूहिक रूप से सावित्री-सत्यवान कथा का श्रवण किया तथा मंगल गीत गाए।
“विवाहित स्त्रियों के सौभाग्य का प्रतीक है यह व्रत” — कल्पना झा
पटना में पूजा कर रहीं व्रती कल्पना झा ने कहा— “मैं विवाहोपरांत नियमित रूप से यह व्रत करती हूं और सावित्री-सत्यवान की कथा का पाठ भी करती हूं। यह पूजा विवाहित स्त्रियों के लिए सौभाग्य, समर्पण और परिवार की मंगलकामना का प्रतीक है।” उन्होंने कहा कि यह पर्व महिलाओं को धैर्य, प्रेम, त्याग और आत्मबल की प्रेरणा देता है।
सावित्री और सत्यवान की अमर कथा
वट सावित्री व्रत की आध्यात्मिक प्रेरणा महाभारत में वर्णित उस महान कथा से मिलती है जिसमें राजकुमारी सावित्री ने अपने साहस, ज्ञान और अटूट निष्ठा के बल पर अपने पति सत्यवान को मृत्यु के मुख से वापस प्राप्त किया था।
कथा के अनुसार देवर्षि नारद ने सावित्री को पहले ही बता दिया था कि सत्यवान की आयु अत्यंत अल्प है और विवाह के एक वर्ष बाद उनकी मृत्यु निश्चित है। इसके बावजूद सावित्री ने सत्यवान को ही अपना पति चुना।
निर्धारित दिन जब यमराज सत्यवान के प्राण लेने आए, तब सावित्री भी उनके पीछे चल पड़ीं। अपने धर्म, तर्क, विनम्रता और ज्ञानपूर्ण संवाद से उन्होंने यमराज को प्रसन्न कर लिया। अंततः यमराज ने सत्यवान को पुनर्जीवन प्रदान किया।
यह कथा भारतीय संस्कृति में प्रेम, निष्ठा, धैर्य और बुद्धिमत्ता की सर्वोच्च मिसाल मानी जाती है।
वट वृक्ष : दीर्घायु और जीवन शक्ति का प्रतीक
इस व्रत में वट वृक्ष (बरगद) की पूजा की जाती है। सनातन परंपरा में वट वृक्ष को—
दीर्घायु
स्थिरता
अमरत्व तथा जीवन शक्ति का प्रतीक माना गया है। इसकी विशाल जड़ें और विस्तृत शाखाएँ परिवार की एकता, स्थायित्व और पीढ़ियों की निरंतरता का संदेश देती हैं।
मिथिला में बरगद के वृक्ष को लोक आस्था और प्रकृति संरक्षण से भी जोड़ा जाता है।
पूजा-विधि और पारंपरिक अनुष्ठान
व्रती महिलाएँ प्रातः स्नान कर पति एवं परिवार के कल्याण का संकल्प लेती हैं। इसके बाद वे वट वृक्ष की पूजा कर विभिन्न अनुष्ठान संपन्न करती हैं।
प्रमुख पूजा सामग्री
सिंदूर एवं कुमकुम
पुष्प एवं फल, मिठाई, पान के पत्ते, लाल मौली, जल एवं दीप
प्रमुख अनुष्ठान
वट वृक्ष की जड़ों में जल अर्पित करना
वृक्ष के तने पर मौली बांधना
3, 7, 11 या 108 बार परिक्रमा करना
सावित्री-सत्यवान कथा का पाठ एवं श्रवण करना
बिहार के अनेक मंदिरों और सार्वजनिक स्थलों पर महिलाओं ने सामूहिक पूजा एवं कथा कार्यक्रमों में भाग लिया।
आधुनिक समय में भी जीवंत है परंपरा
आज के आधुनिक जीवन में भी वट सावित्री व्रत की परंपरा पूरी श्रद्धा से निभाई जा रही है। यह पर्व वैवाहिक जीवन की मंगलकामना का प्रतीक है, भारतीय समाज में नारी शक्ति, पारिवारिक एकता और प्रकृति के प्रति सम्मान का संदेश भी देता है।
बरगद वृक्ष की पूजा पर्यावरण संरक्षण और प्रकृति के साथ सामंजस्य की भारतीय परंपरा को भी दर्शाती है।
वट सावित्री व्रत 2026 के पावन अवसर पर सभी व्रती महिलाओं को ईश्वर जीवन में सुख, सौभाग्य, अखंड दांपत्य प्रेम, उत्तम स्वास्थ्य और समृद्धि प्रदान करें।
वट सावित्री व्रत भारतीय संस्कृति की उस अमर चेतना का प्रतीक है, जो प्रेम, विश्वास, धैर्य, निष्ठा और धर्म के शाश्वत मूल्यों को पीढ़ी-दर-पीढ़ी जीवित रखे हुए है।