
पुस्तक समीक्षक : सुरेन्द्र कुमार रंजन, संपादक, साहित्यकार एवं कवि
बिहार के वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखक जितेन्द्र कुमार सिन्हा की चौथी कृति ‘गया जी’ प्रकाशित होकर पाठकों के बीच आ चुकी है। 122 पृष्ठों में प्रकाशित यह पुस्तक गया की धार्मिक, आध्यात्मिक, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्ता को सहज एवं सरल भाषा में प्रस्तुत करती है। पुस्तक का मूल्य मात्र ₹299 है और इसका प्रकाशन ऑरेंज बुक पब्लिकेशन, छत्तीसगढ़ द्वारा किया गया है।
गया केवल एक शहर नहीं है, बल्कि भारतीय धार्मिक चेतना में एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण तीर्थभूमि है। यहां धर्म, मोक्ष, ज्ञान, आस्था और इतिहास का अद्भुत संगम दिखाई देता है। लेखक जितेन्द्र कुमार सिन्हा ने इसी बहुआयामी पहचान को अपनी पुस्तक ‘गया जी’ का विषय बनाया है।
लेखक ने पुस्तक को दो प्रमुख खंडों में विभाजित किया है। छोटे-छोटे पाठों के माध्यम से गया जी से जुड़े धार्मिक एवं ऐतिहासिक विषयों को पाठकों के सामने रखा गया है। भाषा सहज, सरल और प्रवाहपूर्ण है, जिसके कारण पुस्तक सामान्य पाठक के साथ-साथ धार्मिक एवं ऐतिहासिक विषयों में रुचि रखने वाले पाठकों के लिए भी उपयोगी बन जाती है।
पुस्तक में गयासुर, भगवान विष्णु और उनके चरणचिह्न विष्णुपद, फल्गु नदी, विष्णुपद मंदिर, पितरों की मोक्ष-प्रक्रिया तथा गया जी के विभिन्न मोक्ष स्थलों का उल्लेख किया गया है। इन विषयों के माध्यम से लेखक ने गया की धार्मिक पहचान और उससे जुड़ी मान्यताओं को समझाने का प्रयास किया है।
गया की धार्मिक पहचान की चर्चा गयासुर की कथा के बिना अधूरी मानी जाती है। पुस्तक में गयासुर से जुड़ी मान्यताओं को स्थान देकर लेखक ने गया जी के धार्मिक आख्यान की मूल कड़ी को पाठकों के सामने रखा है। भगवान विष्णु के चरणचिह्न से जुड़ा विष्णुपद गया जी की पहचान का प्रमुख केंद्र है। लेखक ने विष्णुपद और उससे संबंधित धार्मिक मान्यताओं को सरल भाषा में प्रस्तुत किया है। इससे पाठक गया जी की आध्यात्मिक परंपरा को केवल एक तीर्थ के रूप में नहीं, बल्कि सदियों से चली आ रही धार्मिक आस्था की परंपरा के रूप में समझ सकता है।
गया जी की चर्चा फल्गु नदी के बिना भी पूरी नहीं हो सकती। धार्मिक दृष्टि से फल्गु का विशेष महत्त्व है और पितरों के लिए किए जाने वाले कर्मकांडों से इसका गहरा संबंध है। पुस्तक में पितरों की मोक्ष प्रक्रिया तथा गया जी में होने वाले विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों का उल्लेख किया गया है। लेखक ने इन विषयों को जटिल बनाने के बजाय छोटे-छोटे पाठों के माध्यम से पाठकों के लिए सुगम व सरल बनाया है। इस पुस्तक की एक प्रमुख विशेषता यह है कि गंभीर विषयों को बड़े ही सहज भाषा में प्रस्तुत किया गया है।
गया जी को भारतीय धार्मिक परंपरा में मोक्षभूमि के रूप में विशेष स्थान प्राप्त है। देश के विभिन्न हिस्सों से लोग यहां पितरों के निमित्त धार्मिक कर्मकांड करने आते हैं। पुस्तक में गया के विभिन्न मोक्ष स्थलों और उनके धार्मिक महत्त्व पर भी प्रकाश डाला गया है। लेखक ने केवल धार्मिक मान्यताओं को सामने रखने तक स्वयं को सीमित नहीं रखा, बल्कि गया जी शहर के अनेक महत्त्वपूर्ण स्थानों की चर्चा भी की है। इस दृष्टि से ‘गया जी’ धार्मिक पुस्तक होने के साथ-साथ एक उपयोगी परिचयात्मक पुस्तक भी बन जाती है।
‘गया जी’ की सबसे उल्लेखनीय विशेषता इसकी भाषा है। लेखक ने कठिन धार्मिक और ऐतिहासिक विषयों को बोझिल बनाने के बजाय सामान्य पाठक की समझ के अनुरूप प्रस्तुत किया है। छोटे-छोटे पाठ पाठक को विषय से जोड़े रखते हैं। यही कारण है कि पुस्तक को एक साथ पढ़ने के बजाय पाठक अपनी रुचि के अनुसार किसी भी विषय से शुरुआत कर सकता है।
जितेन्द्र कुमार सिन्हा लंबे समय से पत्रकारिता और लेखन से जुड़े रहे हैं। उनके लेखन में विषय को संक्षिप्त, स्पष्ट और तथ्यपरक ढंग से प्रस्तुत करने की पत्रकारिता शैली दिखाई देती है। उनकी खास बात यह है कि वे लगातार धार्मिक एवं आध्यात्मिक विषयों और उनसे जुड़े महत्त्वपूर्ण स्थानों पर लिख रहे हैं। यह प्रयास केवल साहित्यिक अभिरुचि का परिचायक नहीं है, बल्कि हमारी सांस्कृतिक और धार्मिक विरासत को सामान्य पाठकों तक पहुंचाने का भी माध्यम है।
‘गया जी’ का महत्त्व केवल सामान्य पाठकों तक सीमित नहीं है। गया के धार्मिक इतिहास, तीर्थ परंपरा और सांस्कृतिक विरासत का अध्ययन करने वाले विद्यार्थियों एवं शोधार्थियों के लिए भी यह पुस्तक प्रारंभिक संदर्भ सामग्री के रूप में उपयोगी साबित हो सकती है। हालांकि किसी भी गंभीर शोध के लिए मूल ऐतिहासिक एवं शास्त्रीय स्रोतों का अध्ययन आवश्यक होगा, फिर भी ‘गया जी’ जैसे सरल परिचयात्मक ग्रंथ विषय को समझने की एक अच्छी शुरुआत उपलब्ध कराते हैं।
पुस्तक की सबसे महत्त्वपूर्ण उपलब्धि यह है कि यह धर्म और इतिहास के बीच संवाद स्थापित करने का प्रयास करती है। गया जी के बारे में लोगों के मन में अनेक धार्मिक कथाएं, परंपराएं और मान्यताएं हैं। लेखक ने इन्हें एक क्रम में प्रस्तुत करके पाठकों को गया जी की व्यापक पहचान से परिचित कराने का एक सफल प्रयास किया है। गया जी केवल पिंडदान और श्राद्ध का स्थान नहीं है। यह भारतीय सभ्यता, आस्था, इतिहास और सांस्कृतिक स्मृति का भी महत्त्वपूर्ण केंद्र है। ‘गया जी’ इसी व्यापक दृष्टि को पाठकों के सामने रखने का प्रयास करती है।
सुरेन्द्र कुमार रंजन के रूप में मेरा मानना है कि ‘गया जी’ एक ज्ञानवर्धक , सारगर्भित,पठनीय और संग्रहणीय पुस्तक है। इसकी विषय-वस्तु, सरल भाषा और छोटे-छोटे पाठ इसे सहज पाठ्य बनाते हैं। विशेष रूप से उन पाठकों के लिए यह पुस्तक उपयोगी है, जो गया जी के धार्मिक महत्त्व, पौराणिक मान्यताओं और प्रमुख तीर्थ स्थलों के बारे में एक साथ जानकारी प्राप्त करना चाहते हैं। जितेन्द्र कुमार सिन्हा लगातार लेखन कर रहे हैं और उनकी रचनात्मक यात्रा में धर्म, अध्यात्म एवं भारतीय सांस्कृतिक विरासत से जुड़े विषयों को विशेष स्थान मिल रहा है। किसी धार्मिक स्थल को केवल पर्यटन की दृष्टि से देखने के बजाय उसकी धार्मिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि को शब्द देना निश्चित रूप से प्रशंसनीय कार्य है। ‘गया जी’ इसी लेखकीय प्रयास की एक महत्त्वपूर्ण कड़ी है।
समग्र रूप से कहा जा सकता है कि ‘गया जी’ गया की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान को सरल भाषा में समझने का एक उपयोगी प्रयास है। गयासुर की कथा से लेकर विष्णुपद, फल्गु नदी, पितरों की मोक्ष परंपरा और गया जी के विभिन्न धार्मिक स्थलों तक लेखक ने विषय को व्यापक रूप में प्रस्तुत किया है। 122 पृष्ठों की यह पुस्तक आकार में भले ही छोटी हो, लेकिन इसका विषय अत्यंत व्यापक और महत्त्वपूर्ण है। आने वाले समय में यह पुस्तक गया जी की धार्मिक-सांस्कृतिक परंपरा को समझने वाले पाठकों के साथ-साथ शोधार्थियों के लिए भी उपयोगी साबित हो सकती है। जितेन्द्र कुमार सिन्हा की चौथी कृति ‘गया जी’ के प्रकाशन पर उन्हें हार्दिक बधाई और उनकी निरंतर साहित्यिक यात्रा के लिए शुभकामनाएं।
— सुरेन्द्र कुमार रंजन, संपादक, साहित्यकार एवं कवि