लेखक : अवधेश झा
माइए संसारक आधार छथि, आ बिना माइ केँ संसार सँ मुक्ति सेहो संभव नहि अछि। ऐ संसार मे एहन कोनो प्राणी नहि अछि, जेकरा माइ नहि हो। से कारणे समस्त माताक माता स्वयं दुर्गा माइ छथि। “माइ” शब्दक अर्थ अछि मूल स्रोत, जतए सँ समस्त सृष्टिक उद्भव भेल अछि। संतान अपन माइ केँ बिसरि सकैत अछि, मुदा माइ अपन संतान केँ कखनो नहि बिसरैत।
जँ धरि—माटि सँ बनल घड़ा केँ ई स्मरण नहि रहैत अछि जे ओकर मूल माटिए अछि, मुदा माटि सदिखन जानैत अछि जे ओकर रूप चाहे घड़ा हो, मुदा मूलमे ओ माटिए अछि। अर्थात्
माटि सँ बनल घड़ाक रूप, रंग आ नाम भले भिन्न हो, मुदा ओ मूलतः माटिए अछि। ओहि तरहे आत्माक वास्तविक स्वरूप परम माइ सँ अभिन्न अछि। माइए अपन संतानक जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति आ तुरीय—ई चारु अवस्थाक अधिष्ठात्री छथि। बिना हुनकर कृपा सँ कोनो जीव एहि अवस्थासभ केँ पार नहि कऽ सकैत अछि। जे साधक एहि अवस्थासभ सँ ऊपर उठिकऽ आत्मस्वरूपमे प्रतिष्ठित होइत अछि, से माइक वास्तविक सत्ता केँ अनुभव करैत अछि।
नवरात्रिक पावन अवसर पर संवाद क्रममे पटना उच्च न्यायालयक पूर्व न्यायमूर्ति श्री राजेन्द्र प्रसाद कहलनि—
**“श्रीदुर्गासप्तशतीक प्रारम्भमे भगवान शंकर पार्वतीजी सँ कहैत छथि—
देव्याः अष्टशती विद्या गुप्ता कैश्चिद् विनेयकैः।
अहं तु सर्वसारार्थं वक्ष्यामि सप्तश्लोकीकाम्॥
अर्थात्—समस्त दुर्गासप्तशतीक सार सात श्लोकमे निहित अछि। जँ कोनो साधक दुःख, संकट, भय अथवा सांसारिक आवश्यकता सँ घेरल हो, त सप्तश्लोकी दुर्गाक पाठ करबाक फलसँ ओकरा शीघ्र माइ केर कृपा प्राप्त होइत अछि।”**
एहि सँ स्पष्ट होइत अछि जे माइ केवल सांसारिक इच्छासभक पूर्ति नहि करैत छथि, बल्कि जीवनक बाधासभ केँ सेहो दूर करैत छथि। राजा सुरथ आ समाधि वैश्यक कथा, जे दुर्गासप्तशतीक तेरहम अध्यायमे वर्णित अछि, एहि सत्यक जीवंत उदाहरण अछि।
राजा सुरथ अपन राज्य हारि दुखी छलाह। समाधि वैश्य, जेकरा अपन परिवार सँ मोहभंग भेल छल, वैराग्यसँ व्याकुल छलाह।
दुनू माइ केर तपस्या केलनि। प्रसन्न भऽ माइ कहलनि—
“वरं वृणुध्वं भद्रं वो यदवद्य मनोऽभिलषितम्।”
राजा पुनः राज्य प्राप्त करबाक कामना केलनि, जबकि वैश्य मोक्षक वर मँगलनि। माइ दुनू केँ वरदान देलनि—राजा सुरथ केँ आगाँक जन्ममे चक्रवर्ती साम्राज्य आ अन्ततः मोक्ष प्राप्त भेलनि, आ समाधि वैश्य केँ तत्काल आत्मज्ञान आ मुक्ति प्राप्त भेलनि।
एहि कथा सँ स्पष्ट अछि जे माइ दुर्गा कामना-पूर्ति आ मोक्षक दात्री छथि।
वास्तवमे, माइ विद्या आ अविद्या दुनूक अधिष्ठात्री छथि।
देवीमहात्म्यमे कहल गेल अछि—
ॐ ज्ञानिनामपि चेतांसि देवी भगवती हि सा।
बलादाकृष्य मोहाय महामाया प्रयच्छति॥
भावार्थ—माइ महामाया विद्वानसभक हृदय केँ सेहो मोहमे डुबा सकैत छथि। मुदा आत्मज्ञानी केँ बन्धनसँ मुक्त राखैत छथि।
यहि हुनकर प्रारम्भिक स्वरूप अछि—माया आ शक्ति केर अधिष्ठात्री। ओ जीव केँ संसारक प्रवाहमे प्रवृत्त करैत छथि, जेना से अपन कामनासभक पूर्ति कऽ सकै, वैराग्य धारण कऽ सकै आ अन्ततः मोक्षक ओर बढ़ि सकै।
माइ दुर्गाक स्वरूप त्रिविध अछि—
प्रारम्भमे—माया स्वरूपिणी : जे जीव केँ संसारमे प्रवृत्त करैत छथि।
मध्यमे—कल्याणकारिणी : जे जीवनक सभ आयाममे—बुद्धि, दया, क्षमा, तृष्णा, छाया, लक्ष्मी आदिमे शक्ति दैत छथि।
अन्तमे—मोक्षदायिनी : जे साधकक अन्तिम आकांक्षा पूर्ण कऽ ओकरा परमगति प्रदान करैत छथि।
एहि प्रकारे माइ दुर्गा छथि—कामनाक पूर्तिकर्त्री, जीवनक संरक्षिका आ मोक्षक प्रदायिनी। माइ दुर्गा जीवक जीवन केँ प्रारम्भ सँ अन्त धरि मार्गदर्शन करैत छथि। ओहि माइ माया छथि, ओहि शक्ति छथि, ओहि करुणा छथि आ ओहि परब्रह्म स्वरूपिणी मुक्ति दात्री सेहो।