- कोमल कुमारी
मैं जीवन हूं,मुझे जीने दो,
मुझे भी पन्नों में खिलने दो।
वो कहते हैं मैं चिड़ियां हूं,
दूर देश की रैना हूं।
फिर क्यों पिंजरों में रहना हो,
क्यों घूंघट का फिर पर्दा हो ?
मैं जीवन हूं,मुझे जीने दो,
मुझे भी पन्नों में खिलने दो।
वो कहते हैं कल पढ़ना तुम,
आज! घर बस जाए,कल उड़ना तुम।
ये रीत रस्म ,जग की बातें,
क्यों मुझसे यह बेगानी है।
क्या दुनिया पर मैं कालिख हूं,
या जीवन पर उधारी हूं।
ग़र हूं इज़्ज़त मैं घर की तो,
फिर क्यों होठों की गाली हूं?
मैं जीवन हूं,मुझे जीने दो,
मुझे भी पन्नों में खिलने दो।
जात धर्म और गोत्र क्या हैं,
सब मुझसे जन्मे,वंश क्या है।
मैं तृष्णा की जो दलदल हूं,
मैं हीं कृष्णा की राधा भी।
मुझे सजा , मंदिर में पूजो ,
कभी दाम लो,मंडी बेचों।
या प्रथा बना तुम भस्म करो x2
मैं जाल फंसी जब मछली हूं।
तुम चाहो तो स्वीकार करो,
या फिर मुझ पर तुम वार करो।
मैं जीवन हूं,मुझे जीने दो,
मुझे भी पन्नों में खिलने दो।
मै कोई गुमसुम कली नहीं अब,
जिसे तोड़ ,सजा लो आँगन अपने!
दुर्गा हूं, दुर्गति नहीं अब!
सपनो पर अधिकार है मेरा
मैं आसमान की चादर हूं!
मैं नारी हूं, नव भानु हूं,
मैं प्रेम की बहती सरिता हूं
मैंपरम पिता की कविता हूं।
मैं जीवन हूं मुझे जीने दो,
मुझ में सपनों को पलने दो।