गले के संक्रमण में लापरवाही प्राणघातक

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(डॉ. शशि रंजन से वरिष्ठ पत्रकार सुरेन्द्र कुमार रंजन की विशेष साक्षात्कार पर आधारित)

सुरेन्द्र कुमार रंजन, पटना, 24 मई ::

आज की तेज रफ्तार और तनावपूर्ण जीवनशैली ने मनुष्य को मानसिक और शारीरिक दोनों रूपों से प्रभावित किया है। दैनिक जीवन की भागदौड़, कार्य का दबाव और सामाजिक प्रतिस्पर्धा के बीच अनेक लोग तनाव से राहत पाने के लिए पान मसाला, गुटखा, तंबाकू, शराब और अन्य नशीले पदार्थों का सहारा लेने लगे हैं। प्रारंभ में यह आदत मामूली लगती है, लेकिन धीरे-धीरे यह गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं का कारण बन जाती है। विशेष रूप से गले और मुख से जुड़ी बीमारियां आज तेजी से बढ़ रही हैं, जिनमें थोड़ी-सी लापरवाही भी जानलेवा साबित हो सकती है। नाक, कान और गला रोग विशेषज्ञ डॉ. शशि रंजन एवं उनकी सहयोगी डॉ. पामिला सिन्हा के अनुसार, गले के संक्रमण और उससे जुड़ी बीमारियों को हल्के में लेना अत्यंत खतरनाक हो सकता है।

डॉ. शशि रंजन के अनुसार, गले की बीमारियां मुख्य रूप से तीन कारणों से उत्पन्न होती हैं- संक्रमण (इन्फेक्शन), एलर्जी और मांस वृद्धि (टिश्यू ग्रोथ)। इनमें संक्रमण सबसे सामान्य और प्रभावशाली कारण माना जाता है। संक्रमण मुख्यतः तीन प्रकार के होते हैं- बैक्टीरियल संक्रमण, वायरल संक्रमण और फंगल संक्रमण। इन संक्रमणों से टॉन्सिलाइटिस, लैरिन्जाइटिस और फैरिन्जाइटिस जैसी गंभीर बीमारियां उत्पन्न होती हैं।

टॉन्सिल के संक्रमण को टॉन्सिलाइटिस कहा जाता है। लगभग 80 से 90 प्रतिशत मामलों में इसका कारण स्ट्रेप्टोकॉकस बैक्टीरिया होता है, जबकि शेष मामलों में वायरस जिम्मेदार होते हैं। इसके प्रमुख लक्षण होते हैं गले में असहनीय दर्द, निगलने में कठिनाई, टॉन्सिल का सूजना, बुखार, सांसों से दुर्गंध आना, गले में जलन और सूजन। इस रोग की पहचान के लिए गले के अंदर का स्वाब परीक्षण किया जाता है। जांच के आधार पर उचित दवा दी जाती है। चूंकि यह संक्रमणजनित बीमारी है, इसलिए रोगी से दूरी बनाए रखना आवश्यक होता है क्योंकि छींक या सांस के माध्यम से संक्रमण फैल सकता है।

डिप्थीरियल टॉन्सिलाइटिस- यह टॉन्सिलाइटिस का अत्यंत खतरनाक रूप है। इसमें टॉन्सिल के ऊपर एक झिल्ली बन जाती है जो श्वास मार्ग को अवरुद्ध कर सकती है। इसके प्रमुख लक्षण हैं सांस लेने में कठिनाई, गले में सूजन, तेज बुखार और गले में झिल्ली बनना। डॉ. शशि रंजन बताते हैं कि प्रारंभिक अवस्था में इसका इलाज संभव है, लेकिन देर होने पर स्थिति गंभीर हो जाती है। ऐसे मरीजों को घर में नहीं बल्कि अस्पताल में भर्ती कर इलाज करना चाहिए।

तीव्र लैरिन्जाइटिस- यह बीमारी संक्रमण और एलर्जी दोनों कारणों से हो सकती है। इसमें स्वर तंत्र यानि वोकल कॉर्ड संक्रमित हो जाते हैं। इसके लक्षण हैं आवाज का भारी होना, बोलने में कठिनाई, गले में दर्द, बुखार, सांस लेने में परेशानी और सिरदर्द। सर्दी-जुकाम, मीजल्स, इन्फ्लुएंजा और ब्रोंकाइटिस जैसी बीमारियां भी इसका कारण बन सकती हैं। समय रहते उपचार नहीं कराने पर यह रोग गंभीर रूप ले सकता है।

दीर्घकालिक लैरिन्जाइटिस- इसे क्रॉनिक लैरिन्जाइटिस भी कहा जाता है। इस बीमारी में रोगी की आवाज लगातार कर्कश होती जाती है। इसके लक्षण होते हैं गले में सूखापन, लगातार खसखसाहट, आवाज बैठना और बोलने में कठिनाई। डॉ. शशि रंजन के अनुसार कुछ मामलों में यह क्षयरोग (टीबी) से भी संबंधित हो सकता है, इसलिए टीबी जांच कराना आवश्यक होता है।

फैरिन्जाइटिस- यह गले की आम बीमारी है, लेकिन यदि इसे नजरअंदाज किया जाए तो परेशानी बढ़ सकती है। इसके प्रमुख लक्षण है गले में दर्द, टॉन्सिल लाल होना, गले में कुछ फंसा होने जैसा एहसास और खसखसाहट। इसके घरेलू उपाय है गुनगुने पानी में नमक डालकर दिन में तीन से चार बार गरारा करें। चिकित्सकीय सलाह पर एंटीबायोटिक दवा लें।

डॉ. शशि रंजन के अनुसार, गले में मांस वृद्धि से होने वाली बीमारियां अत्यंत गंभीर होती हैं। इन्हें दो वर्गों में बांटा गया है – गैर कैंसरयुक्त (बेनाइन) और कैंसरयुक्त। गैर कैंसरयुक्त रोग भी समय पर इलाज न होने पर कैंसर में बदल सकते हैं।

ल्यूकोप्लैकिया- इस बीमारी में गाल के अंदर, जीभ और तालु पर सफेद धब्बे बनने लगते हैं। शुरुआत में लोग इसे सामान्य समझकर अनदेखा कर देते हैं, लेकिन यही लापरवाही बाद में कैंसर का कारण बन सकती है। इसकी पुष्टि के लिए बायोप्सी की जाती है।

एरिथ्रोप्लैकिया- इस रोग में गाल, तालु और जीभ के अंदर लाल धब्बे दिखाई देते हैं। डॉक्टरों के अनुसार, यह स्थिति अत्यंत गंभीर मानी जाती है क्योंकि इसमें कैंसर बनने की संभावना अधिक होती है। समय पर बायोप्सी और जांच आवश्यक है।

सबम्यूकस फाइब्रोसिस- यह बीमारी पान मसाला, गुटखा, कसैली और तंबाकू के अत्यधिक सेवन से होती है। इसके प्रमुख लक्षण है मुंह पूरी तरह नहीं खुलना, गालों और जीभ का सफेद पड़ना, असहनीय दर्द और खाने-पीने में परेशानी। यह बीमारी धीरे-धीरे ओरल कैंसर में बदल सकती है। बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र में ऐसे मरीजों की संख्या अधिक पाई जाती है।

डॉ. शशि रंजन के अनुसार यदि कुछ सावधानियां अपनाई जाएं तो इन गंभीर रोगों से बचा जा सकता है- तंबाकू, गुटखा और शराब से दूरी बनाएं, गले के दर्द को सामान्य समझकर अनदेखा न करें, लंबे समय तक आवाज बैठने पर जांच कराएं, बार-बार संक्रमण होने पर विशेषज्ञ से परामर्श लें, स्वच्छता और संतुलित आहार अपनाएं और धूम्रपान से बचें।

डॉ. शशि रंजन चिकित्सा क्षेत्र के एक प्रतिष्ठित नाम हैं। उनकी प्रमुख उपलब्धियां हैं 1989 में पटना मेडिकल कॉलेज से एमबीबीएस की उपाधि। चार विषयों में डिस्टिंक्शन प्राप्त। 1994 में मुंबई से ऑटोरिनो लैरिंगोलॉजी डिप्लोमा। 1995 में एमएस परीक्षा में गोल्ड मेडल। 1996 से बिहार में लगातार चिकित्सा सेवा। वहीं डॉ. पामिला सिन्हा ने 1993 में नालंदा मेडिकल कॉलेज से एमबीबीएस की उपाधि प्राप्त की और स्वास्थ्य सेवा में महत्वपूर्ण योगदान दे रही हैं।

गले की बीमारियां शुरुआत में सामान्य प्रतीत होती हैं, लेकिन लापरवाही इन्हें गंभीर और प्राणघातक बना सकती है। विशेष रूप से तंबाकू और नशीले पदार्थों का सेवन गले और मुख के कैंसर का प्रमुख कारण बनता जा रहा है। समय पर जांच, उचित उपचार और जागरूकता ही इन रोगों से बचाव का सबसे प्रभावी उपाय है। स्वास्थ्य के प्रति सजग रहना ही सुरक्षित जीवन की कुंजी है।

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