– विंग कमांडर (सेवानिवृत्त) उमेन्द्र कुमार त्रिपाठी
पटना: 26 जुलाई 2026 :: 26 जुलाई भारत के इतिहास का वह गौरवशाली दिवस है, जब हमारे वीर सैनिकों ने अदम्य साहस, अनुशासन और सर्वोच्च बलिदान के बल पर कारगिल की दुर्गम चोटियों पर पुनः तिरंगा फहराकर विश्व को भारत की अटूट सैन्य क्षमता और राष्ट्रीय संकल्प का परिचय दिया। यह केवल एक सैन्य विजय नहीं थी, बल्कि पूरे राष्ट्र की सामूहिक शक्ति, एकता और विश्वास की ऐतिहासिक विजय थी।
कारगिल युद्ध के समय मैं भारतीय वायु सेना में रसद (Logistics) एवं आपूर्ति व्यवस्था से संबंधित दायित्वों का निर्वहन कर रहा था। सामान्यतः मार्च से सितंबर तक का समय लद्दाख क्षेत्र में पूरे वर्ष की आवश्यक सामग्रियों के भंडारण (Stocking) का होता है। उस समय सड़क संपर्क आज की तरह विकसित नहीं था। अटल सुरंग (Atal Tunnel) जैसी सुविधा उपलब्ध नहीं थी और शीत ऋतु में भारी हिमपात के कारण सड़क मार्ग कई महीनों तक लगभग बंद हो जाते थे। ऐसे में भोजन, ईंधन, विमान ईंधन (ATF), केरोसिन, गोला-बारूद तथा अन्य आवश्यक सैन्य सामग्री समय रहते पर्याप्त मात्रा में पहुँचाना अत्यंत आवश्यक होता था।
इसी महत्वपूर्ण अवधि में पाकिस्तान द्वारा घुसपैठ कर कारगिल संघर्ष प्रारंभ किया गया। परिस्थितियाँ अत्यंत चुनौतीपूर्ण थीं, किंतु भारतीय सशस्त्र बलों के साथ-साथ देश के सामान्य नागरिकों ने जिस साहस, धैर्य और समर्पण का परिचय दिया, वह भारतीय इतिहास का गौरवपूर्ण अध्याय बन गया।
मैं विशेष रूप से उन नागरिक ट्रक चालकों को नमन करता हूँ, जिन्होंने अपने प्राणों की परवाह किए बिना दुर्गम पर्वतीय मार्गों पर सैन्य सामग्री पहुँचाने का दायित्व निभाया। वे वर्दी में नहीं थे, परंतु उनका साहस किसी सैनिक से कम नहीं था। उनके योगदान के बिना युद्धकालीन रसद व्यवस्था को सुचारु बनाए रखना अत्यंत कठिन होता।
इसी प्रकार, उन चिकित्सकों, नर्सों और अस्पतालों के प्रति भी मैं अपनी गहरी कृतज्ञता व्यक्त करता हूँ, जिन्होंने दिन-रात घायल सैनिकों की सेवा में स्वयं को समर्पित रखा। युद्ध केवल सीमाओं पर नहीं लड़ा जाता; उसके पीछे असंख्य ऐसे अनाम नायक होते हैं, जिनके समर्पण और सेवा से ही विजय का मार्ग प्रशस्त होता है।
कारगिल युद्ध ने यह भी सिद्ध किया कि भारतीय सेना का मनोबल केवल उसके शस्त्रों और प्रशिक्षण से ही नहीं, बल्कि देशवासियों के अटूट विश्वास, प्रेम और समर्थन से भी सुदृढ़ होता है। मुझे आज भी स्मरण है कि लद्दाख की विषम परिस्थितियों के बीच सुप्रसिद्ध ओडिसी नृत्यांगना एवं पद्म विभूषण श्रीमती सोनल मानसिंह सैनिकों के बीच पहुँचीं और अपनी सांस्कृतिक प्रस्तुति से उनका मनोबल बढ़ाया। वह केवल एक कार्यक्रम नहीं था, बल्कि पूरे राष्ट्र की ओर से सैनिकों के प्रति सम्मान, कृतज्ञता और विश्वास की सशक्त अभिव्यक्ति थी।
इसी प्रकार तत्कालीन प्रधानमंत्री एवं भारत रत्न स्वर्गीय श्री अटल बिहारी वाजपेयी का अग्रिम क्षेत्र में पहुँचकर सैनिकों का उत्साहवर्धन करना हम सभी के लिए अत्यंत प्रेरणादायक अनुभव था। उनकी उपस्थिति और उनके प्रेरक शब्दों ने प्रत्येक सैनिक को यह विश्वास दिलाया कि पूरा राष्ट्र उसके साथ दृढ़ता से खड़ा है।
कारगिल विजय हमें यह महत्वपूर्ण संदेश देती है कि किसी भी युद्ध की सफलता केवल रणभूमि में लड़ रहे सैनिकों की वीरता से नहीं, बल्कि सुदृढ़ रसद व्यवस्था, समर्पित नागरिकों, चिकित्साकर्मियों, ट्रक चालकों, कलाकारों, दूरदर्शी राजनीतिक नेतृत्व और पूरे राष्ट्र की एकजुट भावना से सुनिश्चित होती है। यही “राष्ट्र प्रथम” की वास्तविक भावना है।
आज कारगिल विजय दिवस के अवसर पर मैं उन सभी ज्ञात-अज्ञात वीरों, अमर शहीदों, सैनिकों, नागरिक सहयोगियों, चिकित्साकर्मियों, ट्रक चालकों, कलाकारों तथा प्रत्येक देशवासी के प्रति अपनी हार्दिक कृतज्ञता और श्रद्धांजलि अर्पित करता हूँ, जिनके सामूहिक प्रयासों से भारत ने यह ऐतिहासिक विजय प्राप्त की।
कारगिल की विजय हमें सदैव स्मरण कराती रहेगी कि जब पूरा राष्ट्र एक संकल्प, एक उद्देश्य और एक विश्वास के साथ खड़ा होता है, तब हिमालय की सबसे ऊँची चोटियाँ भी भारत के तिरंगे के समक्ष नतमस्तक हो जाती हैं।
जय हिन्द!
कारगिल विजय दिवस (26 जुलाई) पर विशेष लेख
(लेखक परिचय: विंग कमांडर (सेवानिवृत्त) उमेन्द्र कुमार त्रिपाठी, भारतीय वायु सेना के पूर्व अधिकारी। कारगिल युद्ध के दौरान वायु सेना में रसद एवं आपूर्ति व्यवस्था से संबंधित महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन किया। राष्ट्रीय सुरक्षा, सैन्य विषयों एवं राष्ट्र निर्माण से जुड़े विषयों पर नियमित लेखन करते हैं।यह संस्करण समाचारपत्र, पत्रिका, स्मारिका अथवा वेब-पोर्टल में प्रकाशन के लिए उपयुक्त शैली में तैयार किया गया है। यदि चाहें, इसे 800–1000 शब्दों के समाचार-पत्र संस्करण या 500–600 शब्दों के संक्षिप्त संस्करण में भी तैयार किया जा सकता है।)