पटना: 4 अक्टूबर 2025 :: वरिष्ठ पत्रकार और कला लेखिका रीना सोपम की पुस्तक ‘हस्ताक्षर: कला इतिहास में बिहार की महिलाएँ’ का लोकार्पण पटना स्थित जगजीवन राम संसदीय अध्ययन एवं राजनीतिक शोध संस्थान में आयोजित एक गरिमामय समारोह में किया गया। इस अवसर पर कला, साहित्य और संस्कृति से जुड़े अनेक बुद्धिजीवी, कलाकार और संगीत प्रेमी उपस्थित थे।
कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रो. लावण्य कीर्ति सिंह काव्या ने की। उन्होंने कहा कि यह पुस्तक बिहार की सांस्कृतिक चेतना को नई दिशा देगी और आने वाले समय में और भी महिलाएँ ‘हस्ताक्षर’ की तरह अपने रचनात्मक योगदान से जुड़ेंगी।
जद (यू) प्रवक्ता राजीव रंजन ने कहा कि “विरासत को सहेजना अपने आप में एक बड़ा काम है। रीना सोपम ने इस पुस्तक के माध्यम से उस सांस्कृतिक विरासत को शब्दों में बाँधने का महत्वपूर्ण कार्य किया है।”
प्रो. एन.के. अग्रवाल ने कहा कि “कला के क्षेत्र में उस दौर में महिलाओं का काम करना आसान नहीं था, फिर भी उन्होंने अपनी पहचान कायम की।”
प्रो. मंगलारानी ने कहा कि “रीना ने कलाकार परिवार में कलम पकड़कर यह साबित किया है कि लेखन भी एक गहन कला है।”
निशा झा ने पुस्तक की सराहना करते हुए कहा कि “यह किताब बिहार की कला परंपरा के इतिहास को सामने लाती है। सरकार और समाज को इसे प्रोत्साहित करना चाहिए।”
इस अवसर पर प्रकाशक पियूष जी ने लेखक और प्रकाशक के रिश्ते पर अपने विचार साझा किए। प्रसिद्ध लोकगायिका शारदा सिन्हा की बेटी वंदना ने शारदा जी का एक गीत गाकर उपस्थित लोगों को मंत्रमुग्ध कर दिया। कार्यक्रम का संचालन किशोर सिन्हा ने किया, जबकि पत्रकार एवं शायर नीलांशु रंजन ने धन्यवाद ज्ञापन करते हुए रीना सोपम के संघर्षपूर्ण पत्रकारिता जीवन का उल्लेख किया।
पुस्तक का सार: कला इतिहास में महिलाओं की अमिट छाप
‘हस्ताक्षर: कला इतिहास में बिहार की महिलाएँ’, प्रभात प्रकाशन से प्रकाशित यह पुस्तक बिहार की उन 19 विशिष्ट महिला कलाकारों के जीवन, संघर्ष और योगदान का दस्तावेज है, जिन्होंने समाज की सीमाओं को लाँघकर कला के क्षेत्र में अपनी पहचान स्थापित की।
इसमें लोकगायिका विंध्यवासिनी देवी, कुमुद अखौरी, शारदा सिन्हा, शांति जैन, गिरिजा सिंह, चंदना डे, डॉ. रमा दास, नलिनी जोशी, नवनीत शर्मा, और नूर फातिमा जैसी प्रतिभाओं के योगदान का विस्तार से वर्णन है।
पुस्तक का एक विशेष खंड उन महिलाओं पर केंद्रित है जिन्होंने कला और कलाकारों के संरक्षण में भूमिका निभाई — जिनमें बेगम अजीजा इमाम, सावित्री देवी, और उमा-गौरी चटर्जी जैसी हस्तियाँ शामिल हैं।
लेखिका ने पुस्तक में यह दिखाया है कि कैसे इन महिलाओं ने घर की चारदीवारी से मंच तक का कठिन सफर तय किया, सामाजिक चुनौतियों का सामना किया और बिहार की कला परंपरा को नई ऊँचाइयाँ दीं। पुस्तक के अंतिम अध्याय में उत्तर भारत की शास्त्रीय नृत्य शैली कत्थक में बिहार की महिलाओं की भागीदारी पर भी विस्तृत चर्चा की गई है।
इस लोकार्पण समारोह ने न केवल एक महत्वपूर्ण पुस्तक को प्रस्तुत किया, बल्कि बिहार की सांस्कृतिक और कलात्मक विरासत के पुनर्स्मरण का अवसर भी प्रदान किया।