आधुनिक जीवनशैली में तनाव, मानसिक दबाव, भावनात्मक असंतुलन और भागदौड़ के बीच मानसिक स्वास्थ्य का महत्त्व लगातार बढ़ता जा रहा है। अब चिकित्सा जगत में भी शारीरिक स्वास्थ्य के साथ मानसिक स्वास्थ्य को समान महत्त्व देने की आवश्यकता महसूस की जा रही है। इसी दिशा में ‘माइंड रिजुवेनेशन साइंस’ (मन पुनर्जीवन विज्ञान) भविष्य में चिकित्सा पद्धति का एक महत्त्वपूर्ण अंग बन सकता है। यह कहना है बिहार कॉलेज ऑफ फिजियोथेरेपी एंड ओक्यूपेशनल थेरेपी (बीसीपीओ), पटना के विभागाध्यक्ष सह नियंत्रण पदाधिकारी डॉ प्रियदर्शी आलोक का।
बिहार कॉलेज ऑफ फिजियोथेरेपी एंड ओक्यूपेशनल थेरेपी, पटना में ‘विश्व व्यावसायिक चिकित्सा दिवस 2026 उत्सव पखवाड़ा’ के अंतर्गत विभिन्न कार्यक्रमों के साथ दो वैज्ञानिक सत्र आयोजित किए जा रहे हैं। इसी क्रम में पहला वैज्ञानिक सत्र कॉलेज के सभागार में आयोजित किया गया। इसमें ‘माइंड रिजुवेनेशन साइंस’ विषय पर एक इंटरैक्टिव एवं अनुभवात्मक कार्यशाला का आयोजन हुआ। दूसरा वैज्ञानिक सत्र आगामी 11 नवंबर 2026 को इसी सभागार में आयोजित किया जाएगा।
कार्यक्रम का उद्घाटन संयुक्त रूप से डॉ प्रियदर्शी आलोक, सह प्राध्यापक एवं कार्यक्रम समन्वयक डॉ अभय कुमार जायसवाल, फिजियोथेरेपी विभागाध्यक्ष डॉ मनोज कुमार, ओक्यूपेशनल थेरेपी विभागाध्यक्ष डॉ उदय कुमार तथा शैक्षणिक प्रभारी डॉ उमेश कुमार ने किया। इसके बाद मुख्य संसाधन व्यक्ति कुमार राजीव और विभिन्न समाचार पत्रों से जुड़े तथा डीआरएम न्यूज 24 के ब्यूरो चीफ सुरेंद्र कुमार रंजन ने संयुक्त रूप से दीप प्रज्वलित कर वैज्ञानिक सत्र का विधिवत शुभारंभ किया।
सभा को संबोधित करते हुए डॉ प्रियदर्शी आलोक ने कहा कि ‘माइंड रिजुवेनेशन साइंस’ भविष्य में चिकित्सा पद्धति का एक महत्त्वपूर्ण अंग बनेगा। उन्होंने कहा कि चिकित्सा के क्षेत्र में निरंतर हो रहे बदलावों के बीच मानसिक स्वास्थ्य, तनाव प्रबंधन और मन की कार्यप्रणाली को समझना भी जरूरी है। इस प्रकार के वैज्ञानिक सत्र विद्यार्थियों और चिकित्सकीय पेशे से जुड़े लोगों को ज्ञान के नए आयामों से परिचित कराते हैं।
उन्होंने आगामी 11 नवंबर को आयोजित होने वाले दूसरे वैज्ञानिक सत्र की जानकारी भी दी। इसका विषय ‘Recent Advances in Neuro Rehabilitation’ अर्थात न्यूरो रिहैबिलिटेशन में नवीनतम प्रगति होगा। इस सत्र के संसाधन व्यक्ति डॉ नीरज मिश्रा होंगे।
कार्यक्रम के समन्वयक डॉ अभय कुमार जायसवाल ने अपने संबोधन में कहा कि वर्तमान समय में फिजियोथेरेपी और ओक्यूपेशनल थेरेपी के विद्यार्थियों के लिए शारीरिक स्वास्थ्य के साथ-साथ मानसिक स्वास्थ्य का ज्ञान भी अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने कहा कि किसी व्यक्ति के संपूर्ण स्वास्थ्य और बेहतर जीवन के लिए शरीर और मन दोनों के बीच संतुलन जरूरी है। इसलिए चिकित्सा शिक्षा में मानसिक स्वास्थ्य से संबंधित विषयों को भी पर्याप्त स्थान मिलना चाहिए।
कार्यशाला के मुख्य संसाधन व्यक्ति कुमार राजीव मानव मन, व्यवहार और चेतना के क्षेत्र में वैज्ञानिक एवं स्वतंत्र शोधकर्ता हैं। उन्होंने लगभग तीन दशकों तक मानव मन, व्यवहार और कल्याण पर उनके प्रभाव को समझने के लिए शोध एवं अन्वेषण किया है। उन्हें ‘माइंड रिजुवेनेशन साइंस’ का जनक बताया जाता है।
उन्होंने अपने व्याख्यान में ‘Pause, Rejuvenate & Design the Mind’ अर्थात ‘रुकें, मन को पुनर्जीवित करें और मन को नई दिशा दें’ की अवधारणा को विस्तार से समझाया। इस सिद्धांत का मूल आधार आत्म-अवलोकन, मानसिक स्पष्टता, भावनात्मक संतुलन, तनाव प्रबंधन और रचनात्मक व्यवहार है।
उन्होंने बताया कि मनुष्य की मानसिक क्षमता को बेहतर बनाने के लिए जरूरी है कि वह कुछ समय अपने भीतर झांकने, अपने विचारों को समझने और भावनाओं का विश्लेषण करने में लगाए। लगातार भागदौड़ और बाहरी दबाव के बीच मन को ठहराव देना तथा सकारात्मक सोच विकसित करना जीवन की गुणवत्ता को बेहतर बनाने में सहायक हो सकता है।
आज जब मानसिक तनाव और जीवनशैली से जुड़ी समस्याएं समाज के विभिन्न वर्गों को प्रभावित कर रही हैं, तब इस तरह की कार्यशालाओं का महत्त्व और बढ़ जाता है। फिजियोथेरेपी और ओक्यूपेशनल थेरेपी का उद्देश्य केवल शारीरिक क्षमता को पुनर्स्थापित करना नहीं, बल्कि व्यक्ति को बेहतर और आत्मनिर्भर जीवन जीने में सक्षम बनाना भी है। ऐसे में मानसिक स्वास्थ्य की समझ इस उद्देश्य को अधिक व्यापक बना सकती है।
कार्यक्रम का सफल संचालन डॉ अभय कुमार जायसवाल ने किया। इसमें बड़ी संख्या में चिकित्सक, फिजियोथेरेपिस्ट, ओक्यूपेशनल थेरेपिस्ट, छात्र-छात्राएं एवं कॉलेज के कर्मचारी उपस्थित रहे। अंत में डॉ उदय कुमार ने धन्यवाद ज्ञापन किया और कार्यक्रम का समापन हुआ।
विश्व व्यावसायिक चिकित्सा दिवस के अवसर पर आयोजित यह वैज्ञानिक पहल चिकित्सा शिक्षा में शरीर और मन के समन्वित स्वास्थ्य की आवश्यकता को रेखांकित करती है। आने वाले समय में ऐसी अवधारणाएं चिकित्सा एवं पुनर्वास के क्षेत्र में नई संभावनाओं के द्वार खोल सकती है।