लोकतंत्र में पत्रकारिता को समाज का सजग प्रहरी माना जाता है। पत्रकार अपनी लेखनी और खबरों के माध्यम से आम जनता की समस्याओं को सामने लाते हैं तथा सरकार और प्रशासन को उनकी जिम्मेदारियों का अहसास कराते हैं। जनहित से जुड़े मुद्दों को उजागर करने के लिए पत्रकारों को कभी गांवों की पगडंडियों पर जाना पड़ता है, तो कभी दूरदराज के इलाकों में सरकारी योजनाओं की वास्तविक स्थिति का जायजा लेना पड़ता है। दुर्घटनाओं, प्राकृतिक आपदाओं, सामाजिक समस्याओं और जनआंदोलनों की रिपोर्टिंग के लिए भी उन्हें लगातार यात्रा करनी पड़ती है। ऐसे में यदि पत्रकारों को सरकारी बसों में निःशुल्क यात्रा की सुविधा मिल जाए, तो यह उनके लिए बड़ी राहत साबित हो सकती है।
बिहार में मान्यता प्राप्त पत्रकारों के लिए सरकारी बसों में मुफ्त यात्रा की सुविधा दोबारा शुरू करने की मांग इसी संदर्भ में महत्वपूर्ण हो गई है। राष्ट्रीय पत्रकार सुरक्षा आयोग के राष्ट्रीय अध्यक्ष निशिकांत राय ने इस मांग को लेकर बिहार सरकार के परिवहन मंत्री को ज्ञापन सौंपा है। मंत्री कार्यालय की ओर से आवेदन पर संज्ञान लिए जाने के बाद पत्रकारों में इस सुविधा की बहाली को लेकर उम्मीद जगी है।
राष्ट्रीय पत्रकार सुरक्षा आयोग ने अपने ज्ञापन में बिहार की पुरानी व्यवस्था का उल्लेख किया है। आयोग के अनुसार, 1990 के दशक में राज्य के मान्यता प्राप्त पत्रकारों, विधायकों और स्वतंत्रता सेनानियों को बिहार राज्य पथ परिवहन निगम की बसों में निःशुल्क यात्रा की सुविधा उपलब्ध थी। बाद में किन्हीं कारणों से यह व्यवस्था बंद कर दी गई।
अब आयोग ने इस पुरानी सुविधा को फिर से बहाल करने की मांग उठाई है। आयोग का मानना है कि पत्रकारों को उनके पेशेवर दायित्वों के निर्वहन में सहयोग देना सरकार की सकारात्मक पहल होगी। अन्य राज्यों में पत्रकारों को मिलने वाली विभिन्न सुविधाओं का उदाहरण देते हुए बिहार में भी इस दिशा में निर्णय लेने की अपील की गई है। यह मांग केवल एक सुविधा को दोबारा शुरू करने तक सीमित नहीं है, बल्कि पत्रकारों की कार्यगत आवश्यकताओं और आर्थिक चुनौतियों को समझने से भी जुड़ी है।
पत्रकारिता का काम केवल कार्यालय में बैठकर समाचार लिखने तक सीमित नहीं है। किसी घटना की वास्तविकता जानने, पीड़ित परिवारों से बातचीत करने, अधिकारियों का पक्ष लेने और घटनास्थल की स्थिति समझने के लिए पत्रकारों को मौके पर पहुंचना पड़ता है। ग्रामीण क्षेत्रों में काम करने वाले पत्रकारों के सामने यह चुनौती और अधिक गंभीर होती है।
कई बार एक ही दिन में अलग-अलग स्थानों पर जाकर समाचार संकलन करना पड़ता है। इसके लिए बस, ऑटो, ट्रेन या अन्य साधनों का इस्तेमाल करना होता है। लगातार बढ़ते परिवहन खर्च का सीधा असर पत्रकारों की जेब पर पड़ता है। खासकर छोटे शहरों और ग्रामीण इलाकों में काम करने वाले पत्रकारों के लिए यह खर्च आर्थिक परेशानी का कारण बन सकता है। ऐसे समय में सरकारी बसों में मुफ्त यात्रा की सुविधा मिलने से उन्हें कुछ आर्थिक राहत मिल सकती है। इससे वे उपलब्ध संसाधनों का बेहतर उपयोग करते हुए अपने पेशेवर दायित्वों को अधिक प्रभावी ढंग से निभा सकेंगे।
पत्रकार समाज और शासन के बीच संवाद की महत्वपूर्ण कड़ी होते हैं। वे जनता की समस्याओं को प्रशासन तक पहुंचाते हैं और सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन की वास्तविक स्थिति सामने लाते हैं। सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य, बिजली, पेयजल, कृषि और रोजगार जैसे विषयों पर उनकी रिपोर्टिंग आम लोगों के जीवन से सीधे जुड़ी होती है।
यात्रा खर्च के कारण पत्रकारों को समाचार संकलन में कठिनाई होती है, तो इसका असर जमीनी स्तर की रिपोर्टिंग पर भी पड़ सकता है। निःशुल्क बस सेवा जैसी सुविधा इस कठिनाई को कम करने में मदद कर सकती है। हालांकि, इसके साथ पत्रकारों की सुरक्षा, सम्मान और कार्यक्षेत्र में स्वतंत्रता जैसे विषयों पर भी ध्यान देना आवश्यक है। सरकार को यह समझना होगा कि पत्रकारों के हित में उठाया गया व्यावहारिक कदम अंततः जनहित की पत्रकारिता को मजबूत करने में सहायक हो सकता है।
राष्ट्रीय पत्रकार सुरक्षा आयोग ने बिहार सरकार और परिवहन विभाग से इस मांग पर शीघ्र सकारात्मक निर्णय लेने की अपील की है। आयोग की पहल से पत्रकारों के बीच इस विषय पर चर्चा तेज होने की संभावना है। पत्रकार संगठनों की अपेक्षा है कि सरकार इस मांग को केवल प्रशासनिक प्रस्ताव के रूप में नहीं, बल्कि पत्रकारों की कार्यगत जरूरतों से जुड़े विषय के रूप में देखे।
मंत्री कार्यालय द्वारा आवेदन पर संज्ञान लिया जाना सकारात्मक संकेत है, लेकिन इसे सुविधा बहाल होने का अंतिम निर्णय नहीं माना जा सकता है। इसके लिए परिवहन विभाग को योजना के स्वरूप, पात्रता, पहचान-पत्र, यात्रा संबंधी नियमों और वित्तीय व्यवस्था जैसे पहलुओं पर विचार करना होगा।
बिहार सरकार यदि मान्यता प्राप्त पत्रकारों के लिए निःशुल्क बस यात्रा की सुविधा बहाल करने का निर्णय लेती है, तो इससे बड़ी संख्या में पत्रकारों को लाभ मिल सकता है। इसके लिए स्पष्ट नियम बनाकर पात्र पत्रकारों को पहचान-पत्र या अन्य अधिकृत माध्यम से सुविधा उपलब्ध कराई जा सकती है। यह भी आवश्यक है कि योजना पारदर्शी हो और इसका लाभ वास्तविक रूप से समाचार संकलन में लगे पात्र पत्रकारों तक पहुंचे। परिवहन विभाग चरणबद्ध तरीके से इसकी व्यवहार्यता का आकलन कर सकता है।
पत्रकारों के लिए मुफ्त बस सेवा की बहाली की मांग पर सरकार को गंभीरता से विचार करना चाहिए। पत्रकार अपने व्यक्तिगत हितों से आगे बढ़कर समाज की समस्याओं को सामने लाने का काम करते हैं। उनके काम को सुगम बनाने वाली सुविधाएं लोकतांत्रिक व्यवस्था को भी मजबूत करती हैं। अब पत्रकारों की निगाहें बिहार सरकार और परिवहन विभाग के अगले कदम पर टिकी है। उम्मीद है कि पुरानी सुविधा को नए स्वरूप में बहाल करने की दिशा में सकारात्मक पहल होगी, ताकि पत्रकार आर्थिक दबाव से कुछ हद तक मुक्त होकर जनहित की खबरों को अधिक प्रभावी ढंग से सामने ला सके।