पुष्प का प्रेम

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  • अवधेश झा

मानस पटल से दर्शन,
और खुले आंखों से बेचैन ।
जग देखे जिस आंखों से
सास्वत सौंदर्य, वो है मेरी नैन।।

मिलूं, गले लगू या अर्पित हूं
मैं,जग से उनको समर्पित हूं।
मुझे व्यथा नहीं मुरझाने की,
मैं हर अवस्था में सारगर्भित हूं ।।

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